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Showing posts from April, 2020

लारा (एक प्रेम कहानी) भाग 4

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  Behind the Scenes Love Story ❤ (Part 4) कभी-कभी सबसे मुश्किल काम… बस एक message भेजना होता है सोमा के फोन में अब भी वही chat list थी। बस एक नाम अब वहाँ नहीं था। राम ने कुछ नहीं किया था — न block किया, न unfriend। बस सोमा ने खुद ही उस नाम को हटा दिया था। गुस्से में। उस रात। और आज वही गुस्सा पछतावा बनकर सीने में बैठा था। वो कई बार WhatsApp खोलती, ऊपर search bar तक जाती, उँगली वहीं रुक जाती। फिर बिना कुछ टाइप किए screen बंद कर देती। जैसे नाम लिखते ही सब कुछ सच हो जाएगा। रात को सोने से पहले उसकी एक पुरानी आदत थी — "Good night" लिखकर phone side में रखना। अब भी वो वही करती थी। बस message नहीं भेजती थी। typing box खुलता… दो-तीन शब्द बनते… उँगलियाँ रुक जातीं। फिर backspace। खाली। हर रात। कभी-कभी वो खुद से बचने के लिए Facebook खोल लेती। राम की नई पोस्ट ढूँढती। पढ़ती। scroll करती। लेकिन हर पोस्ट के बाद कुछ सेकंड तक screen पर ही अटकी रहती। नीली रोशनी आँखों में चुभती थी — पर वो हटाती नहीं थी नज़र। जैसे शब्द खत्म हो गए हों, पर असर अभी बाकी हो। एक दिन उसने kitchen में चाय बनाई। दो कप निक...

पर्दा हटा रखना।

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पलकें  भिगो  कर  सींचा  है  हमने हो  सके  वतन को हरा भरा रखना। वर्षा  नहीं  सकते हो दो फूल मुझ पर पत्थर फेंकने से खुद को बचा रखना। बीच  की  दूरियों को इतना सज़ा रखना हो सके हथेलियों को सफा-सफा रखना शौक  नहीं लाठियां  भांजने  का मुझे हो  सके  पलकों  से  पर्दा हटा रखना। न  दे  सको  दान  एक फूटी कौड़ी भी राष्ट्र  हित  में  तिज़ोरी  खुला  रखना।               'दरिया'

#पालघर

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बेशर्म  बेहया  निकम्मी  हो  गयी पुलिस पालघर की दल्ली हो गयी। घुटने  टेक  दिए  हैवानों  के आगे रक्षक कैसे इतनी डल्ली हो गयी। अज्ञानता  इतनी  पसर गयी वहॉं समझ  सकी  न  भाषा  संतों की संतों को पीट - पीट कर मार डाला मानवता कैसे इतनी निठल्ली हो गयी। #पालघर

बस अकेला रहा।

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तन्हाइयों  का  लगा  ऐसा  मेला  रहा मैं  जहां  भी  गया  बस  अकेला रहा। शक थी तो बस अपनी काबिलियत पर मैं  ईमानदार  गुरु  का  भ्रस्ट चेला रहा। लोगों ने  चाहा  भी  तो कुछ इस कदर व्यहार  अपनों  का  भी  सौतेला  रहा। ख़ौफ़ खंजरों से कभी खाया नहीं हमने रूप प्यार का ही जहरीला सपेला रहा। सेहत  सुधरे  भी  तो  कैसे  सनम का फलों  में  खाता  ही  सिर्फ़ केला रहा। गर चाहती खुशियां पास आने को कभी खुदा   मारता   गमों का बस ढेला रहा।

दिया

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एक   दिया  क्या  जला   दिया जग  से  अंधेरा   मिटा   दिया। कहता  था जो कहता रह गया बढ़कर हमने फ़र्ज़ निभा दिया। वेशक एक दिये से फर्क नि पड़ता एक-एक कर धरा जगमगा दिया। कोना  कोना यहां रोशन हो गया दिये ने अपना वज़ूद दिखा दिया। दिये से एकता का संदेश बता दिया कुछ इस कदर कोरोना भगा दिया।