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Showing posts from June, 2020

लारा (एक प्रेम कहानी) भाग 4

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  Behind the Scenes Love Story ❤ (Part 4) कभी-कभी सबसे मुश्किल काम… बस एक message भेजना होता है सोमा के फोन में अब भी वही chat list थी। बस एक नाम अब वहाँ नहीं था। राम ने कुछ नहीं किया था — न block किया, न unfriend। बस सोमा ने खुद ही उस नाम को हटा दिया था। गुस्से में। उस रात। और आज वही गुस्सा पछतावा बनकर सीने में बैठा था। वो कई बार WhatsApp खोलती, ऊपर search bar तक जाती, उँगली वहीं रुक जाती। फिर बिना कुछ टाइप किए screen बंद कर देती। जैसे नाम लिखते ही सब कुछ सच हो जाएगा। रात को सोने से पहले उसकी एक पुरानी आदत थी — "Good night" लिखकर phone side में रखना। अब भी वो वही करती थी। बस message नहीं भेजती थी। typing box खुलता… दो-तीन शब्द बनते… उँगलियाँ रुक जातीं। फिर backspace। खाली। हर रात। कभी-कभी वो खुद से बचने के लिए Facebook खोल लेती। राम की नई पोस्ट ढूँढती। पढ़ती। scroll करती। लेकिन हर पोस्ट के बाद कुछ सेकंड तक screen पर ही अटकी रहती। नीली रोशनी आँखों में चुभती थी — पर वो हटाती नहीं थी नज़र। जैसे शब्द खत्म हो गए हों, पर असर अभी बाकी हो। एक दिन उसने kitchen में चाय बनाई। दो कप निक...

बदन सेनेटाइज कर रखा है

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मैंने खुद को कितना कस्टमाइज कर रखा है चेहरे पे मास्क और बदन सेनेटाइज कर रखा है तरसाना छोड़, अब तो आ जाओ न सनम मैंने पूरा दिल अपना फिल्टराइज़ कर रखा है यकीं नही होता तो देख लो बचपन का स्कूल चौदह दिन से  जहां क्वारंटाइन कर रखा है।

लाजबाब हो तुम।

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मेरे इश्क की आखिरी किताब हो तुम               लाजवाब से भी ज्यादा लाजवाब हो तुम।                 मालूम, तारीफ़ सुनने को बेताब हो तुम                मेरी शायरी के हर शब्द का ख्वाब हो तुम।                झकझोर देगी तुम्हे ये खामोसी भी मेरी               मेरे बेचैन सवालों का भी जवाब हो तुम।                 उतार लूँ चांद को जमीं पे गर कहो तुम                मेरे दिल पर हुकूमत-ए- नवाब हो तुम।                लौट भी आओ कि दिल बहुत उदास है            'दरिया' की रोजी रोटी का हिंसाब हो तुम।                                  "दरिया"

मुझे इश्क हो गया।

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तेरे लंबे - लंबे बालों से और सुर्ख गुलाबी गालों से मुझे इश्क हो गया। होंठों की कचनारों से और हिरनी सी चालों से मुझे इश्क हो गया। तेरे जुल्फों की घटाओं से और नयनों की मटकाओं से मुझे इश्क हो गया। तेरे व्यभिचारिणी हालातों से और संग में पीते - खातों से मुझे इश्क हो गया। ग्रीन टी के प्यालों से नाभी और कपालों से मुझे इश्क हो गया। तेरे संग चांदनी रातों से और मीठी - मीठी बातों से मुझे इश्क हो गया। तेरे बदलते अंदाज़ों से नये - नये आगज़ों से मुझे इश्क हो गया। तेरे टूटते होंसलों से बढ़ते गलत फैंसलों से मुझे इश्क हो गया। "दरिया"

पर्यवारण हमारा है।

हवा का सहारा है नदिया का किनारा है सच पूछो तो ये पर्यावरण हमारा है। पहाड़ों को तोड़ कर धाराओं को मोड़ कर जो हुनर हमने दिखया है परिणाम है उसी का आज, बच्चा - बच्चा बेसहारा है। ज़हर घोला है हमने नाला नदियों में खोला है हमने विज्ञान पढ़ पढ़ कर रसायनों का अविष्कार किया हमने परिणाम उसी का है हर इंशान आज बेचारा है। काश दादा की बात माने होते एक पौधा अपने हिस्से में लगाये होते कोने कोने में आज हरियाली होती समृद्धिवान ये पर्यावरण हमारा होता।

मन हरा होता।

हरा- भरा यदि धरा होता न चिंता हमें ज़रा होता। साख - साख मुस्कुराते पत्तियों का मन हरा होता। दोस्ती अपनी कायम होती बातों का गर खरा होता। सरकार योगी की न होती तो खेत इतना चरा न होता। चेताया समय से चीन होता संकट इतना बरा न होता। दोहन प्रकृति का न होता जो ज़र्रा-ज़र्रा इतना जरा न होता। 'दरिया'