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Showing posts from April, 2019

लारा (एक प्रेम कहानी) भाग 4

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  Behind the Scenes Love Story ❤ (Part 4) कभी-कभी सबसे मुश्किल काम… बस एक message भेजना होता है सोमा के फोन में अब भी वही chat list थी। बस एक नाम अब वहाँ नहीं था। राम ने कुछ नहीं किया था — न block किया, न unfriend। बस सोमा ने खुद ही उस नाम को हटा दिया था। गुस्से में। उस रात। और आज वही गुस्सा पछतावा बनकर सीने में बैठा था। वो कई बार WhatsApp खोलती, ऊपर search bar तक जाती, उँगली वहीं रुक जाती। फिर बिना कुछ टाइप किए screen बंद कर देती। जैसे नाम लिखते ही सब कुछ सच हो जाएगा। रात को सोने से पहले उसकी एक पुरानी आदत थी — "Good night" लिखकर phone side में रखना। अब भी वो वही करती थी। बस message नहीं भेजती थी। typing box खुलता… दो-तीन शब्द बनते… उँगलियाँ रुक जातीं। फिर backspace। खाली। हर रात। कभी-कभी वो खुद से बचने के लिए Facebook खोल लेती। राम की नई पोस्ट ढूँढती। पढ़ती। scroll करती। लेकिन हर पोस्ट के बाद कुछ सेकंड तक screen पर ही अटकी रहती। नीली रोशनी आँखों में चुभती थी — पर वो हटाती नहीं थी नज़र। जैसे शब्द खत्म हो गए हों, पर असर अभी बाकी हो। एक दिन उसने kitchen में चाय बनाई। दो कप निक...

झुकती पलकों की मदहोशी

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झुकती पलकों की मदहोशी रस भरे लबों की खामोसी मार डालेगी मुझको इक दिन मासूम चेहरे की अदा भोली सी।।

लड़की नहीं, लड़कों की शान हो तुम।।

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खुशियों की खुशबू दर्द का चुभन गम सी जिंदगी,प्यारा अहसास हो तुम लड़की नहीं, लड़कों की शान हो तुम।। दर्द सह के प्रसन्न रहती भूखे रहके सबका पेट भरती दानी नहीं ,दानवीर का सम्मान हो तुम लड़की नहीं लड़को की शान हो तुम।। पूजा की थाली चाय की प्याली संस्कार की जाली विस्तर की गाली मोम सी मुलायम पत्थर की चट्टान हो तुम।। लड़की नहीं लड़को की शान हो तुम।। बचपन सुहाया चलना सिखाया अधरों का संगम कर बोलना बताया माँ नहीं ममता की अवतार हो तुम लड़की नहीं लड़को की शान हो तुम।। कंपकंपी सी ठंढ गर्मी का पसीना उदास पतझड़ बसन्ती महीना बदली नहीं बिन मौसम बरसात हो तुम लड़की नहीं लड़को की शान हो तुम।।

चमकती आंखों में जो उदासी है ।।

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चमकती आंखों में जो उदासी है टूटते सपने हैं या खुद की सघन तलाशी है।। मैं संग्रह हूँ अपनी असफलताओं का हर जुर्म मेरा है या किस्मत हालात की दासी है।। भरी आंखों से,आंशु छलक ही जाते हैं टीस दिल की है या जगह आंखों में जरा सी है।।                                            रामानुज दरिया

आरज़ू है बस इतनी मेरी ।

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मुड़-मुड़ के जो तू देखे मुझे तेरी ऐसी आदत बन जाऊं आरज़ू है बस इतनी मेरी तेरे दिल की आरज़ू बन जाऊं।। घर-बार ये दुनिया छोड़कर बस तुझ पर अर्पण हो जाऊं बार- बार जो तू देखे मुझे मैं तेरा ही दर्पण हो जाऊं।।

तुम जो देखो मैं वो ख़्वाब हूँ।।

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तुम जो देखो मैं वो ख़्वाब हूँ तुम जो सोंचो मैं वो ज़बाब हूँ पलटो जो कभी इन पन्नों को मैं तुम्हारे ही दिल की किताब हूँ।। तुम जो बजाओ मैं ओ साज़ हूँ तुम जो गिराओ मैं ओ गाज़ हूँ बदल जाऊँ जो मैं पल भर में मैं तुम्हारे ही मूड का मिज़ाज़ हूँ।।

यादों के संग-संग ।।

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पुरानी बहुत बात है कहानी की दिल से शुरुआत है।। देखी थी मैंने एक तस्वीर चांद सी दिखती थी तारों की जागीर।। गज़ गामिन सी चाल थी ओठ गुलाबी सी लाल थी।। केशवों के भी अपने अंदाज़ थे दरिया की लहरों से आगाज़ थे।। पतली कमर बड़ी लचकदार थी गोया सावन झूले की पेंग हर बार थी।। वज़न जवानी का था बढ़ रहा सूंदर काया का रंग था चढ़ रहा।। कौमार्यता की खुमारी थी छायी मानो घटाओं ने सूरज को है छुपायी।। तन - बदन था महक रहा जिसे पाने को दिल था तरस रहा।। संदेह एक ही दिल में समायी थी चाँद धरा पे कैसे उतर आयी थी।। सफर जिंदगानी का यूं ही कटता नहीं हमसफर हो कोई, असर पड़ता नहीं।। नज़रे टिक गयी थी सूरत में जो बदल रही थी प्यारी मूरत में।। प्यार पटरी पर थी आ गयी सूरत दिल में थी समा गयी।। दिन में रूप का नज़ारा था रात में ख्वाबों का सहारा था।। मोहब्बत -ए-जिंदगी थी चलने लगी उनकी यादों में थी शाम ढलने लगी।। तभी वहां ज़हर भरी गाज़ एक आ गिरी टूट गये सपने सभी तार-तार हुयी जिंदगी।। महकती थी कलियां जिसके प्यार में सूख गयी धरती, पानी के अभाव में।। चाहा था मैंने जिसको टूट के अब टूट जाऊंगा उनस...

मैं कुछ नहीं बोलूंगा ।।

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मैं कुछ नहीं बोलूंगा, सब कुछ बता दूंगा तुम पढ़ो मेरी शायरी आइना दिखा दूंगा।

मैं वक्त नहीं जो गुज़र जाऊँ ll

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मैं वक्त नहीं जो गुज़र जाऊँ मैं ख़ुशबू नहीं जो बिखर जाऊँ मैं मोहब्बत का 'दरिया' हूँ सनम जो आकर तेरी बाहों में ठहर जाऊँ ।। रामानुज 'दरिया'

ख़्वाब मगरूर हो गया है।।

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जबरदस्त था हौंसला पतंग का पर डोर हाथ से छूट गया है।। अपराध बढ़ गए जो इश्क की गलियों में हुस्न इक-इक परिंदे को सूट कर गया है ।। घबराकर न छोड़ देना तुम साथ कभी अब टूट बेबसी का भी वज़ूद गया है ।। सज़ा हो जाती, किये हर खता की पर मिटा ओ सारे सबूत गया है ।। आंखें सितारे ढूढ़ती हैं पर ख़्वाब मगरूर हो गया है।। लिपट कर सोता है रात भर तकिया भी मज़बूर हो गया है।। देखता भी नहीं है पलट कर मुझे सुना है बहुत मशहूर हो गया है।। दिखती नहीं 'दरिया' में ओ रवानी सायद महीना मई जून हो गया है।। मत पूछो यौवन कितना जवान है छूकर देखो, रस से भरपूर हो गया है।। पूंछा था, आख़िर क्यों दिया धोखा कहती है,दुनिया का दस्तूर हो गया है।। लेकर जाते हैं फ़रियाद चौखट पर खुदा को, सब कहां मंजूर हो गया है।। मोहब्बत इतनी बदनाम हो गयी कि प्यार करना कसूर हो गया है।। प्यार में तुम घबराओ नहीं 'दरिया' उनकी बातें दिल का नासूर हो गया है।। चाहता कौन नहीं पाना मंज़िल यहाँ पर बेबसी में खटटा अंगूर हो गया है ।। परहेज़ किसे है मख़मली बिस्तर से नसीब में ही छांव, ख़जूर हो गया है ।। तरक्की का आ...