Posts

Showing posts from February, 2022

लारा भाग 5 कुछ रिश्ते लौटते हैं… लेकिन अपनी आवाज़ बदलकर

Image
लारा भाग 5  Behind the Scenes Love Story — Part 5  कुछ रिश्ते लौटते हैं… लेकिन अपनी आवाज़ बदलकर "Hello" के बाद कुछ मिनट तक कोई message नहीं आया। screen जलती… बुझती रही। फिर— typing… रुका। फिर से— typing… "कैसे हैं आप?" एक line। थोड़ा gap। "क्या कर रहे हैं?" send। reply इस बार तुरंत नहीं आया। सोमा ने phone थोड़ा और पास खींच लिया— जैसे दूरी कम करने से जवाब जल्दी आ जाएगा। "तबीयत ठीक नहीं है… ऑफिस से आ गया।" कुछ सेकंड बाद— "लेट रहा हूँ। शायद बुखार है।" सोमा सीधी बैठ गई। उसने सोचा नहीं। बस टाइप किया— "दवा ली?" उधर— राम ने message पढ़ा। typing शुरू की— "मन नहीं था…" रुके। पूरा delete। फिर— "ध्यान नहीं रहा।" send। message भेजने के बाद उसने कुछ सेकंड तक screen नहीं देखी। "ले लेते आते…" सोमा ने जल्दी में टाइप किया। send के बाद उसकी उँगलियाँ एक पल को रुक गईं— जैसे कुछ वापस लेना चाहती हों। पर message वापस नहीं होता। कुछ सेकंड— दोनों तरफ़ सन्नाटा। "घर पर बात हुई?" इस बार reply और देर से आया— "न...

बस रोने को ही जी चाहता है।

Image
  बस  रोने  को   ही   जी   चाहता  है जाने  क्या खोने  को  जी  चाहता है।  बचा   नही   कुछ    भी    अब   मेरा जाने किसका होने को जी चाहता है।  लिपट  कर  रोती  है  ये रात भी रात भर जाने किसके संग सोने को जी चाहता है।  दौलत खूब कमाया उदासी और तन्हाई भी जाने  किस   खजाने  को   जी  चाहता  है।  इर्ष्या  द्वेष  कलह  फ़सल  सारी  तैयार  है जाने कौन सा बीज बोने को जी चाहता है।  ओढ़  ली   कफ़न   खुद   से   रूबरू   होकर जाने कौन सी चादर ओढ़ने को जी चाहता है।

तेरे बिन जिंदगी बसर कैसे हो।

Image
  जो  अमृत  है  ओ  ज़हर  कैसे  हो तेरे  बिन  जिंदगी  बसर  कैसे  हो। ख़्वाबों के अपने  सलीक़े अलग  हैं उजालों में  इनका  असर कैसे  हो। इंसानियत  प्रकृति  की  गोद  में  हो वहां  कुदरत   का   कहर  कैसे  हो। घरों की पहचान बाप के नाम  से हो वह  जगह   कोई   शहर   कैसे  हो। पीने  के  योग्य  भी  न  रह  गया  हो वह  जल स्रोत  कोई  नहर  कैसे  हो। खुदगर्ज़ी की बांध से जो बंध गया हो उस सागर में फिर कोई लहर कैसे हो। ढल  गया  हो  दिन  हवस की दौड़ में फिर उसमें सांझ या दो पहर कैसे हो।

Happy kiss day.

Image
  अच्छे को अच्छा,  बुरे को बुरा कौन कहेगा चा पलूसी के जहां में अब खरा कौन कहेगा। हथेली चूम मोहब्बत -ए- इबारत लिखते थे हवस के दौर में बसंत को हरा कौन कहेगा। सतरंगी  जीवन  में  मरने  के  तरीके  बहुत हैं इश्क  में  मरने  को  अब  मरा  कौन  कहेगा। बदन की भूख में पलने वाले इश्क का  दौर है माथा चूम के,शब्द ,प्यार से भरा,कौन कहेगा। दिखावा ने असल दुनिया से बेदख़ल कर दिया अब  फीके  पकवान  को  सरा  कौन  कहेगा। थोड़े में लिबास ज्यादा ओढ़ने का रस्म है साहब अब  ज्यादा  हैसियत  को  ज़रा  कौन  कहेगा।