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Showing posts from May, 2019

लारा भाग 7 : वो नाम… जो राम ने नहीं सुना था|

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  Behind the Scenes Love Story ❤ ️ Part 7: वो नाम … जो राम ने नहीं सुना था (Definitive Final) वो रात दोनों ने अलग - अलग जागकर गुज़ारी थी। न राम को नींद आई … न सोमा को सुकून मिला। और अगले दिन — शाम ढलते ही राम का फोन आया। सोमा ने कुछ पल स्क्रीन को देखा … फिर कॉल उठा ली। " कल की बात अधूरी रह गई थी …" राम की आवाज़ धीमी थी — थोड़ी थकी हुई। सोमा चुप रही। " सोमा … ऐसी क्या मजबूरी है ?" राम ने धीरे से पूछा , " जो तुम मेरे साथ ऐसा कर रही हो ?" सोमा ने   लंबी साँस ली। जैसे वो शब्द नहीं — बल्कि कोई बोझ उठाने जा रही हो। " राम जी … कारण एक नहीं है। बहुत हैं …" " पहला …" उसकी आवाज़ हल्की काँपी , " मैं उन लोगों को धोखा नहीं दे सकती … जिनकी गोद में पली - बढ़ी हूँ। जिनकी उँगली पकड़कर चलना सीखा। " " और आपकी family…" वो रुकी , " उनका भरोसा तो बिल्कुल नहीं तोड़ सकती। " ...

इक - इक पल बरस सा लगता है।।

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इक - इक पल बरस सा लगता है देख कर मुझे तरस सा लगता है। खो चुका हूँ मैं ख़ुद वज़ूद अपना अपना ही जीवन नरक सा लगता है। मैं   रोज़   खुद   को   मारता हूँ मेरा ज़िस्म मुझे पारस सा लगता है। तुमसे मिलकर, न कोई ख्वाइस बची बदन तेरा मुझे चरस सा लगता है।

Happy Mother's day.माँ मैं तुझे कैसे भूल जाऊं।।

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कभी - कभी मैं सोंचता हूँ उस पंखे से झूल जांऊ जिंदगी हमेशा रुलाती है इसे गहरी नींद में सुला जाऊं।। पर माँ तेरी याद आ जाती है पल भर में मेरी सोंच बदल जाती है मैं सारे गम खुशी से पी जाऊं पर माँ मैं तुझे कैसे भूल जाऊं।। कभी - कभी मैं सोंचता हूँ एक प्याला जहर का लगाऊं नफ़रत - ए - जमाना हो गया अब मैं मौन हो जाऊं।। याद आ जाता है माँ का ओ तराना टूट जाना पर किसी का दिल न दुखाना तेरी मीठी यादों संग गोदी में सो जाऊं माँ मैं तुझे कैसे भूल जाऊं ।। कभी - कभी मैं सोंचता हूँ रेलवे ट्रैक का शिकार हो जाऊं जिंदगी को ऐसी रफ्तार दूँ खुद को न कभी रोंक पाऊं।। उंगली के सहारे चलना सिखाया गम में भी हंसना सिखाया आंचल में खुशियों के फूल बरसाऊं माँ मैं तुझे कैसे भूल जाऊं।। दिल को मन से जोड़ जाऊं खुद को फौलादी  कर जाऊं आत्महत्या सोंचना भी अपराध है यह संदेशा मैं घर -घर भिजवाऊं माँ मैं तुझे कैसे भूल जाऊं।। रामानुज 'दरिया'

चाह कर भी न हम मिल पायेंगे।।

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आज से खत्म ये लड़ाई हुई है दोस्तों से शुरू ये जुदाई हुई है। कौन याद रखता है अतीत की कहानी उगते सूरज की करते हैं सब तो सलामी। कल तक जो हम सब बिछड़ जायेंगे बसी आंखों में नमी न छुपा पायेंगे। टूटकर इस कदर हम बिखर जायेंगे चाह कर भी न हम मिल पायेंगे। यादों का दिल में ऐसा कारवां चलेगा मिलन कि आरज़ू लेकर ये दिन भी बढ़ेगा। ढल जायेगा दिन रात की आग़ोश में सिमट जायेगी जिंदगी मिलन की जोश में। मंजिलें तरक्की तो मिल ही जायेंगी अरमानों के पंछी तो उड़ ही जायेंगे। मिल न पायेंगी ओ बातें पुरानी नये वर्ष की ओ पंखुड़ी निशानी। बोतल घुमाके दिल - ए - राज़ सुनाना क्लास में ओ चिड़िया -सुग्गा उड़ाना। कालेजामों में ओ मिठास न होगी दोस्ती तो होगी पर बेमिशाल न होगी। मेरे दोस्तों इतना ख्याल रखना मुस्कुरा के अपना दिल-ए-हाल कहना । दूर ये सारे गम हो जायेंगे ख्यालों में ही गर मिल जायेंगे। रामानुज 'दरिया'
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काश सीखी हमने भी चमचागीरी होती न    मुश्किलों  की  रात  अँधेरी  होती। यूं   जाकर   ना  मैं   लौट    आता गर  होता  हमारा  भी कोई गहरा नाता पानी  की  मांग  पर  चाय  परोस  देता ना  दिलों  को  उनके  जरा  खरोच देता हर शब्द को उनके पलकों पे सजा लेता खा कर गाली डांट जी भर के मजा लेता काश इन कामों में दिखाई मैंने भी दिलेरी होती न   मुश्किलों   की   रात   अँधेरी   होती। " दरिया"

अश्क।।

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गैर थे जो अश्क बनकर आंखों से बह गये अपने तो आंखों में ही तड़प कर रह गये।। इक गुज़ारिश थी कि दुबारा गम न आये पुराने गम ही दिल में अब घर कर गये।। मनहूस जिंदगी में न बहार आयी कभी हम घूम -घूमकर पतझड़-ए-रेगिस्तान में रह गये।। अज़ीब दास्तां है मोहब्बत-ए-जिंदगी की मंजिल-ए-मोहब्बत को 'दरिया' तलाशते रह गये।।