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Showing posts from January, 2020

लारा भाग 7 : वो नाम… जो राम ने नहीं सुना था|

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  Behind the Scenes Love Story ❤ ️ Part 7: वो नाम … जो राम ने नहीं सुना था (Definitive Final) वो रात दोनों ने अलग - अलग जागकर गुज़ारी थी। न राम को नींद आई … न सोमा को सुकून मिला। और अगले दिन — शाम ढलते ही राम का फोन आया। सोमा ने कुछ पल स्क्रीन को देखा … फिर कॉल उठा ली। " कल की बात अधूरी रह गई थी …" राम की आवाज़ धीमी थी — थोड़ी थकी हुई। सोमा चुप रही। " सोमा … ऐसी क्या मजबूरी है ?" राम ने धीरे से पूछा , " जो तुम मेरे साथ ऐसा कर रही हो ?" सोमा ने   लंबी साँस ली। जैसे वो शब्द नहीं — बल्कि कोई बोझ उठाने जा रही हो। " राम जी … कारण एक नहीं है। बहुत हैं …" " पहला …" उसकी आवाज़ हल्की काँपी , " मैं उन लोगों को धोखा नहीं दे सकती … जिनकी गोद में पली - बढ़ी हूँ। जिनकी उँगली पकड़कर चलना सीखा। " " और आपकी family…" वो रुकी , " उनका भरोसा तो बिल्कुल नहीं तोड़ सकती। " ...

जिंदगी झंड थी झंड ही रह गयी।

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जितनी  भी  ख्वाइशें  थी  दरिया वक्त  की  संदूक  में  बंद रह गयी जिंदगी झंड थी झंड ही रह गयी। न थी पहले  न  कोई  बाद आयी उदासी  जो  दिल में उतर आयी। मैनें   चाहा  भी  तो   क्या   उसे उम्रभर ओ अनजान ही रह गयी जिंदगी झंड थी झंड ही रह गयी। मान  लूंगा  खुदा  शक्ती तुम्हारी बन  जाये  जो  इक  बार हमारी वर्ना  फर्क क्या कब्र और तुझमें अगरबत्तियां पहले भी जलती थी और अब भी जलती ही रह गयी जिंदगी झंड थी झंड ही रह गयी।

Happy जिंदगी

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रख दो ताक पर जिंदगी के अरमान सारे जिम्मेदारियों तले दब गये सपने हमारे। कौतूहल बस कहता था जो माँ से कभी हंस कर लाते थे पिता जी खिलौने सारे। कमा कर भी नहीं खरीद पाता हूँ जो एक आंशू गिराते, मिल जाते थे कपड़े सारे।

मैं मरहम हूं रिश्तों का।

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छोड़  दे  तरासना  ये  वक्त  मुझे, मैं   मूरत   नहीं   बन  सकता। ठोकरें  कितनी  भी  दे  दे  मुझे, मैं चाहतों की सूरत नही बन सकता। मैं   मरहम   हूँ   रिश्तों   का दर्द-ए-घाव नहीं बन सकता। तू वर्तमान तो कभी अतीत बन सकता है पर  मैं  मीठा " दरिया" हूँ   'ये वक्त' कभी खारा समन्दर नहीं बन सकता।      "  दरिया "

हिंसाब होकर रहेगा।

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उठी है कलम तो, हिंसाब होकर रहेगा। मिलेगी सुरक्षा वर्दी को साथ वकीलों के , न्याय होकर रहेगा। चीखता रहे जनमानस भले ही ऑक्सीजन खातिर प्रदूषण प्रकृति के साथ अब पूर्णतयः होकर रहेगा। लाल किले से दहाड़ने वाला शेर भले ही मौन हो जाये, बदली बन प्रदुषण धरा पे छा जाए अंगारें उठती रहें, भले ही वकीलों के हाहाकार से भले दिल्ली वाला मफ़लर गले मे ठिठुर कर रह जाये लेकिन उठी है कलम तो, हिसाब होकर रहेगा। 'दरिया'

याद तुम्हारी आती है।

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रिम झिम बारिस के फुहारों से आते  जाते  इन  त्योहारों    से याद तुम्हारी आती है। नुक्कड़     के    नक्कारों  से बजते ढोलक और नगारों से याद. तुम्हारी आती है। ओलों  की  मारों  से सर्दी  की लाचारों से याद तुम्हारी आती है। जीवन  की  हारों  से व्यथित  मन मारों से याद तुम्हारी आती है। ओठों  की  धारों  से जिस्म की अंगारो से याद तुम्हारी आती है। समर्थन और विरोधों से विकास की अवरोधों से याद तुम्हारी आती है।