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Showing posts from January, 2020

लारा (एक प्रेम कहानी) भाग 4

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  Behind the Scenes Love Story ❤ (Part 4) कभी-कभी सबसे मुश्किल काम… बस एक message भेजना होता है सोमा के फोन में अब भी वही chat list थी। बस एक नाम अब वहाँ नहीं था। राम ने कुछ नहीं किया था — न block किया, न unfriend। बस सोमा ने खुद ही उस नाम को हटा दिया था। गुस्से में। उस रात। और आज वही गुस्सा पछतावा बनकर सीने में बैठा था। वो कई बार WhatsApp खोलती, ऊपर search bar तक जाती, उँगली वहीं रुक जाती। फिर बिना कुछ टाइप किए screen बंद कर देती। जैसे नाम लिखते ही सब कुछ सच हो जाएगा। रात को सोने से पहले उसकी एक पुरानी आदत थी — "Good night" लिखकर phone side में रखना। अब भी वो वही करती थी। बस message नहीं भेजती थी। typing box खुलता… दो-तीन शब्द बनते… उँगलियाँ रुक जातीं। फिर backspace। खाली। हर रात। कभी-कभी वो खुद से बचने के लिए Facebook खोल लेती। राम की नई पोस्ट ढूँढती। पढ़ती। scroll करती। लेकिन हर पोस्ट के बाद कुछ सेकंड तक screen पर ही अटकी रहती। नीली रोशनी आँखों में चुभती थी — पर वो हटाती नहीं थी नज़र। जैसे शब्द खत्म हो गए हों, पर असर अभी बाकी हो। एक दिन उसने kitchen में चाय बनाई। दो कप निक...

जिंदगी झंड थी झंड ही रह गयी।

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जितनी  भी  ख्वाइशें  थी  दरिया वक्त  की  संदूक  में  बंद रह गयी जिंदगी झंड थी झंड ही रह गयी। न थी पहले  न  कोई  बाद आयी उदासी  जो  दिल में उतर आयी। मैनें   चाहा  भी  तो   क्या   उसे उम्रभर ओ अनजान ही रह गयी जिंदगी झंड थी झंड ही रह गयी। मान  लूंगा  खुदा  शक्ती तुम्हारी बन  जाये  जो  इक  बार हमारी वर्ना  फर्क क्या कब्र और तुझमें अगरबत्तियां पहले भी जलती थी और अब भी जलती ही रह गयी जिंदगी झंड थी झंड ही रह गयी।

Happy जिंदगी

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रख दो ताक पर जिंदगी के अरमान सारे जिम्मेदारियों तले दब गये सपने हमारे। कौतूहल बस कहता था जो माँ से कभी हंस कर लाते थे पिता जी खिलौने सारे। कमा कर भी नहीं खरीद पाता हूँ जो एक आंशू गिराते, मिल जाते थे कपड़े सारे।

मैं मरहम हूं रिश्तों का।

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छोड़  दे  तरासना  ये  वक्त  मुझे, मैं   मूरत   नहीं   बन  सकता। ठोकरें  कितनी  भी  दे  दे  मुझे, मैं चाहतों की सूरत नही बन सकता। मैं   मरहम   हूँ   रिश्तों   का दर्द-ए-घाव नहीं बन सकता। तू वर्तमान तो कभी अतीत बन सकता है पर  मैं  मीठा " दरिया" हूँ   'ये वक्त' कभी खारा समन्दर नहीं बन सकता।      "  दरिया "

हिंसाब होकर रहेगा।

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उठी है कलम तो, हिंसाब होकर रहेगा। मिलेगी सुरक्षा वर्दी को साथ वकीलों के , न्याय होकर रहेगा। चीखता रहे जनमानस भले ही ऑक्सीजन खातिर प्रदूषण प्रकृति के साथ अब पूर्णतयः होकर रहेगा। लाल किले से दहाड़ने वाला शेर भले ही मौन हो जाये, बदली बन प्रदुषण धरा पे छा जाए अंगारें उठती रहें, भले ही वकीलों के हाहाकार से भले दिल्ली वाला मफ़लर गले मे ठिठुर कर रह जाये लेकिन उठी है कलम तो, हिसाब होकर रहेगा। 'दरिया'

याद तुम्हारी आती है।

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रिम झिम बारिस के फुहारों से आते  जाते  इन  त्योहारों    से याद तुम्हारी आती है। नुक्कड़     के    नक्कारों  से बजते ढोलक और नगारों से याद. तुम्हारी आती है। ओलों  की  मारों  से सर्दी  की लाचारों से याद तुम्हारी आती है। जीवन  की  हारों  से व्यथित  मन मारों से याद तुम्हारी आती है। ओठों  की  धारों  से जिस्म की अंगारो से याद तुम्हारी आती है। समर्थन और विरोधों से विकास की अवरोधों से याद तुम्हारी आती है।