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दिलकश

उड़ती जुल्फों ने आज शाम कर दी सरेआम हाल-ए-दिल तमाम कर दी। बिन थके हर पहलू को सलाम कर दी बोलने की अदा ने बैठना हराम कर दी यूं तो खामोसी बहुत डसती है सनम तेरी बक बक ने जीना हराम कर दी। भुला भी देता तुझे तो कैसे सनम तूने तो दिल-ए-दरिया गुलाम कर दी। लिखी गमों की दास्ताँ ऐसी खुदा ने हमने त्याग सुखो चैन आराम कर दी इक चाहत थी की चाहूं तुझे मैं सनम चाहत ने ही सरे-आम बदनाम कर दी मैं मुहब्बत के आखिरी पड़ाव में आ गया उसने आज ही आगाज़-ए-अंजाम कर दी।                              रामानुज   'दरिया'

भटका हुआ रही।

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मैं भटका हुआ राही हुँ जाऊं तो कहाँ जाऊं भविष्य अंधकार सा दिखता है पीछे भी गहरी खाई है सब अपने ही हैं पर दिखता कोई अपना किसके गले लगूँ किसको मैं गले लगाऊं। मैं भटका........