लारा भाग 7 : वो नाम… जो राम ने नहीं सुना था|
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Part 7: वो नाम… जो राम ने नहीं सुना था (Definitive Final)
वो
रात दोनों ने अलग-अलग
जागकर गुज़ारी थी।
न
राम को नींद आई…
न सोमा को सुकून
मिला।
और
अगले दिन— शाम ढलते
ही राम का फोन
आया।
सोमा
ने कुछ पल स्क्रीन
को देखा… फिर कॉल उठा
ली।
"कल
की बात अधूरी रह
गई थी…" राम की आवाज़
धीमी थी—थोड़ी थकी
हुई।
सोमा
चुप रही।
"सोमा…
ऐसी क्या मजबूरी है?"
राम ने धीरे से
पूछा, "जो तुम मेरे
साथ ऐसा कर रही
हो?"
सोमा
ने लंबी साँस
ली।
जैसे
वो शब्द नहीं— बल्कि
कोई बोझ उठाने जा
रही हो।
"राम
जी… कारण एक नहीं
है। बहुत हैं…"
"पहला…"
उसकी आवाज़ हल्की काँपी, "मैं उन लोगों
को धोखा नहीं दे
सकती… जिनकी गोद में पली-बढ़ी हूँ। जिनकी
उँगली पकड़कर चलना सीखा।"
"और
आपकी family…" वो रुकी, "उनका
भरोसा तो बिल्कुल नहीं
तोड़ सकती।"
राम
ने आँखें बंद कीं।
"सोमा…"
उन्होंने धीरे से कहा,
"किसी को आदत बना
देना… और फिर अचानक
उससे दूर हो जाना—
ये भी तो धोखा
ही होता है।"
सोमा
चुप रही।
क्योंकि
इस बार— वो सच
जानती थी।
"और
दूसरा कारण…"
उसने
बोलना चाहा— पर आवाज़ जैसे
अटक गई।
कुछ
पल की खामोशी…
फिर—
"मैं…
किसी और से प्यार
करती हूँ।"
उस
एक वाक्य ने— जैसे सब
कुछ रोक दिया।
फोन
के उस पार— सिर्फ़
साँसें रह गईं।
राम
की। भारी। टूटी हुई।
"को…
कोई है?" शब्द अधूरे निकले।
"हाँ…"
सोमा ने धीरे से
कहा, "कोई है… जो
मुझसे बहुत प्यार करता
है। मेरा पहला प्यार
वही है।"
राम
ने सिर झुका लिया।
उन्हें
लगा— जैसे किसी ने
अंदर से कुछ खींच
लिया हो।
एकदम
से। बिना बताए।
"कौन
है वो…?"
इस
बार उनकी आवाज़ में
गुस्सा नहीं था— बस
एक थकी हुई जिज्ञासा।
जैसे
वो जानना भी चाहते थे…
और नहीं भी।
दोनों
एक साथ।
"अगर
कभी… तुमने मुझे अपना माना
है…" राम ने धीमे
से कहा, "तो आज सच
बता दो। पूरा।"
सोमा
की आँखें भर आईं।
सच
बोलना— आज किसी को
बचाना नहीं था… किसी
को तोड़ना था।
उसने
आँखें बंद कीं। और
बोलने लगी।
"एक
app था… Helo। वहाँ एक
profile दिखी— अपनी ही caste का
नाम था। मैंने follow किया।
उन्होंने भी किया।"
"धीरे-धीरे बातें होने
लगीं। तब पता चला—
वो मेरे दूर के
रिश्ते में हैं।"
फिर
सोमा रुकी।
एक
पल।
"उनका
नाम… जय है।"
राम
के होठों पर वो नाम—
जैसे काँच की तरह
टूटा।
उन्होंने
कुछ नहीं कहा।
उँगलियाँ
फोन पर कस गईं।
बस
सुनते रहे।
"मैंने
Nancy नाम से fake ID बनाई थी। वो
मुझे पहचान नहीं पाए। मैं
उन्हें पहचान गई थी— पर
कहा नहीं।"
"जब
उन्होंने नंबर माँगा— मैं
असमंजस में पड़ गई।
किसी रिश्तेदार पर भी इतनी
जल्दी भरोसा नहीं होता।"
"तो
मैंने दूसरा नंबर दिया— जो
कोई नहीं जानता था।"
"एक
शाम उन्होंने call किया।"
सोमा
की आँखें किसी दूर की
याद में खो गईं—
"बोले—
'जितना प्यारा तुम्हारा नाम है… उतनी
ही मीठी तुम्हारी आवाज़
है।'"
"उस
दिन मैं बहुत देर
तक मुस्कुराती रही। अकेले कमरे
में। बिना किसी वजह
के।"
"या
शायद वजह थी— पर
उसे नाम देना नहीं
चाहती थी।"
"वो
PCS की तैयारी करते थे। पूरा
दिन किताबों में। रात दस
बजे सो जाते। सुबह
जल्दी उठते।"
"हमारे
हिस्से में आते थे—
बस वो 10-15 मिनट… जब वो शाम
को घर से बाहर
निकलते।"
"पर
राम जी…" सोमा की आवाज़
में कुछ टूटा—
"वो
15 मिनट— मेरे पूरे दिन
की वजह बन गए
थे।"
"सुबह
उठती थी तो सोचती—
कितने घंटे बाकी हैं।
खाना खाती थी तो
सोचती— अब कितने।"
"और
जब वो call आता— तो जैसे
साँस मिलती थी।"
"दो
हफ्ते ही हुए थे।"
सोमा
ने एक पल रुककर
कहा—
"दो
हफ्तों में इंसान इतना
किसी का कैसे हो
जाता है— यह मुझे
आज भी नहीं पता।"
"एक
रात वो message पर बात कर
रहे थे। बातें खत्म
होने का नाम नहीं
ले रही थीं।"
"और
फिर अचानक— बिना किसी warning के—
उन्होंने लिखा— I love you।"
राम
ने फोन को कान
से थोड़ा दूर किया।
जैसे
आवाज़ सुनना मुश्किल हो रहा हो।
"मैं
कुछ देर screen को देखती रही।"
सोमा की साँस काँप
रही थी, "दिल ज़ोर से
धड़क रहा था। हाथ
काँप रहे थे।"
"मैंने
लिखा— पागल हो गए
हो? समझ में आ
रहा है क्या बोल
रहे हो?"
"उन्होंने
तुरंत लिखा— हाँ। पागल हूँ।
बहुत दिनों से बोलना चाहता
था। आज रुक नहीं
पाया।"
सोमा
रुक गई।
एक
लंबा पल।
"राम
जी…" उसकी आवाज़ बहुत
धीमी हो गई,
"प्यार
तो मुझसे भी हो गया
था। मैंने भी लिख दिया—
I love you too।"
"और
उस रात— मेरे पैर
ज़मीन पर नहीं पड़
रहे थे।"
"पहली
बार किसी ने कहा
था। पहली बार मैंने
कहा था।"
"सोते-जागते, उठते-बैठते— बस
जय। बस उनका ख़याल।"
"हर
सुबह एक ही दुआ
होती थी— जल्दी शाम
हो जाए।"
सोमा
चुप हो गई।
"यही
था राम जी… मेरा
पहला प्यार।"
फोन
के उस पार— कुछ
टूटा।
आवाज़
नहीं आई। पर टूटने
की आहट— महसूस हो
रही थी।
राम
ने फोन मेज़ पर
रख दिया।
कमरे
में अँधेरा उतर रहा था।
उन्होंने
light नहीं जलाई।
शायद
इसलिए— क्योंकि बाहर का अँधेरा
अंदर वाले से कम
था।
वो
खिड़की के पास जाकर
खड़े हो गए।
बाहर
सड़क पर— ज़िंदगी चल
रही थी। जैसे कुछ
हुआ ही नहीं।
लोग
हँस रहे थे। बातें
कर रहे थे।
नीचे
एक बच्चा गिरा— रोया… और फिर खुद
उठकर दौड़ने लगा।
राम
उसे देखते रहे।
काश…
दिल भी इतनी जल्दी उठ पाता।
उन्होंने
दीवार पर टँगी पुरानी
घड़ी को देखा—
जो
बरसों से बंद थी।
किसी
ने ठीक नहीं की।
किसी ने उतारी भी
नहीं।
बस
वहीं थी— टूटी हुई।
पर टंगी हुई।
उन्होंने
फोन उठाया।
"सोमा…"
"हूँ…?"
"पहले
प्यार का नशा… उतरता
भी है।"
सोमा
ने जवाब नहीं दिया।
वो
जानती थी— राम गलत
नहीं थे।
पर
अभी… वो उस सच
से बहुत दूर थी।
फोन
कट गया।
राम
वहीं खड़े रहे।
खिड़की
से बाहर— रात उतर रही
थी।
धीरे-धीरे। चुपचाप।
बिल्कुल
उनके दर्द की तरह।
कुछ
सच… सुने नहीं जाते—
बस
अंदर कहीं गिर जाते हैं… और आवाज़ भी नहीं करते।

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