लारा भाग 7 : वो नाम… जो राम ने नहीं सुना था|
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निरंतर बहते नदी की धारा की तरह एक प्रेम का प्रवाह दूंगा उसे मैं। भले इसके लिए मुझे कितना भी कुंठित क्यों न होना पड़े। हां हां मैंने प्यार किया है उससे और ऐसे ही करता रहूंगा । मुझे यह करने से कोई रोक नहीं सकता न ही समाज और न ही ओ ख़ुद। उसके हाथ में सिर्फ इतना है कि ओ बात नही कर सकती मुझसे और इससे ज्यादा की ओ मुझसे मिलेगी नही कभी।लेकिन कोई बात नहीं, हम इन दोनों के बगैर भी जिंदगी काट लेंगे। हम जीएँगे तो उसके लिए और मरेंगे भी तो सिर्फ उसके लिए।कोई दूसरा न आया है ना ही आयेगा।
लेकिन मैं कभी नहीं चाहता कि ओ किसी और से बात करे या किसी और से मिले यहाँ तक कि उसकी फेसबुक फ्रेंड लिस्ट में भी सिर्फ़ फैमिली हो या फिर मैं।लेकिन प्रेम को इस प्रकाष्ठा तक पहुचाने की सपथ इस कलयुगी दयनीय में ले भी तो कौन, इसलिए आज प्रेम अमरत्व को प्राप्त करने के बजाय हवस का शिकार हो जाते हैं।
आशु के अंदर यही अन्तर्द्वन्द चल रहा था कि अचानक से ड्राइवर ने ब्रेक लगा दी और ओ सीट पर आगे की तरफ झुक गया तथा बगल में अगली दूसरी सीट पर बैठी महिला आगे की तरफ झुक गयी और उसके नो एंट्री वाले पार्ट्स बाहर के तरफ झांकने लगे, जिसे काफी देर से उसका तथाकथित देवर सम्भालने की कोशिश कर रहा था जैसा कि रात के अंधेरे में बल्ब के सहारे दिख रहा था। मौसम की बेजोड़ ठंढ ने रिस्ते की दूरियों को काफी कम करने का प्रयास किया था लेकिन उतना नही कर पाया जिससे कि ओ चरम सुख की तरफ अग्रसित हो पाते फिर भी एक बेहतर प्रयास था जिसे बस के एक तिहाई लोग देख रहे थे बाकी तो सो गए थे क्योंकि समय दो बजे के आसपास हो रहा था। बस एक ढाबे पर आके रुक गई और आशु का ध्यान भी वहीं पर भंग हो गया।
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