लारा (एक प्रेम कहानी) भाग 4

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  Behind the Scenes Love Story ❤ (Part 4) कभी-कभी सबसे मुश्किल काम… बस एक message भेजना होता है सोमा के फोन में अब भी वही chat list थी। बस एक नाम अब वहाँ नहीं था। राम ने कुछ नहीं किया था — न block किया, न unfriend। बस सोमा ने खुद ही उस नाम को हटा दिया था। गुस्से में। उस रात। और आज वही गुस्सा पछतावा बनकर सीने में बैठा था। वो कई बार WhatsApp खोलती, ऊपर search bar तक जाती, उँगली वहीं रुक जाती। फिर बिना कुछ टाइप किए screen बंद कर देती। जैसे नाम लिखते ही सब कुछ सच हो जाएगा। रात को सोने से पहले उसकी एक पुरानी आदत थी — "Good night" लिखकर phone side में रखना। अब भी वो वही करती थी। बस message नहीं भेजती थी। typing box खुलता… दो-तीन शब्द बनते… उँगलियाँ रुक जातीं। फिर backspace। खाली। हर रात। कभी-कभी वो खुद से बचने के लिए Facebook खोल लेती। राम की नई पोस्ट ढूँढती। पढ़ती। scroll करती। लेकिन हर पोस्ट के बाद कुछ सेकंड तक screen पर ही अटकी रहती। नीली रोशनी आँखों में चुभती थी — पर वो हटाती नहीं थी नज़र। जैसे शब्द खत्म हो गए हों, पर असर अभी बाकी हो। एक दिन उसने kitchen में चाय बनाई। दो कप निक...

लारा (भाग 1) एक प्रेम कहानी ।



लारा ( भाग 1)

गाँव की गलियों में धूल सिर्फ रास्तों पर नहीं उड़ती थी…

वो लोगों की सोच में भी बसी रहती थी।

वहाँ शामें जल्दी उतर आती थीं,

और लड़कियों के सपने अक्सर

आँगन की देहरी से बाहर निकलने से पहले ही

दम तोड़ देते थे।

उस गाँव में रहती थी — सोमा।

सीधी-सादी…

साफ दिल वाली…

थोड़ी नटखट…

थोड़ी ज़िद्दी…

और अपनापन मिल जाए तो बहुत बातूनी।

वो उन लड़कियों में से नहीं थी जो हर समय सिर झुकाकर

बस “हाँ” और “ठीक है” में जिंदगी काट दें।

उसकी हँसी खुली हुई थी,

उसका दिल साफ था,

और उसकी सोच…

उसके गाँव से कहीं बड़ी।

वो जानती थी कि

गाँव में लड़की का ज़्यादा हँसना,

फोन चलाना,

अपने लिए सोचना,

और दुनिया को समझना —

चार अलग बातें नहीं मानी जातीं,

एक ही “गलती” मान ली जाती है।

लेकिन सोमा की सबसे बड़ी बात ये थी कि

वो इन बातों से डरती ज़रूर थी…

रुकती नहीं थी।

वो चुपचाप बगावत करने वाली लड़की थी।

शोर मचाकर नहीं…

अपने तरीके से।

वो अक्सर अपनी माँ से कहती—

“गलत काम करने से लोग कुछ कहें तो समझ आता है…

लेकिन सही जीने से भी अगर लोग जलें,

तो दिक्कत मुझमें नहीं… उनकी सोच में है।”

उसकी माँ उसे देखतीं

और बस हल्का-सा मुस्कुरा देतीं।

क्योंकि वो जानती थीं—

उनकी बेटी गाँव में जन्मी ज़रूर है,

लेकिन उसकी सोच

किसी बंद आँगन में पलने वाली नहीं।

एक लड़की… जो सिर्फ खूबसूरत नहीं, समझदार भी थी

सोमा उस उम्र की देहरी पर खड़ी थी

जहाँ लड़कपन

धीरे-धीरे जवानी में बदलने लगता है।

उसके चेहरे पर कोई बनावटी चमक नहीं थी,

न शहरों वाली सजावट,

न खुद को दिखाने की आदत।

लेकिन उसमें कुछ ऐसा था

जो पहली नज़र में शोर नहीं करता था…

और दूसरी नज़र में दिल पर उतर जाता था।

उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में

एक अजीब-सी गहराई थी—

जैसे उनमें कोई अधूरी कहानी रहती हो।

उसकी मुस्कान में

एक सच्चाई थी।

वो खुलकर हँस देती,

तो सामने वाले का मन

बिना वजह हल्का हो जाता।

लेकिन सोमा की असली खूबसूरती

उसके चेहरे में नहीं थी…

उसकी असली खूबसूरती थी —

उसका सोचने का तरीका।

वो छोटी-छोटी चीज़ों में

बड़ी बातें ढूँढ लेती थी।

एक दिन सिलाई करते हुए

उसने अपनी सहेली से हँसकर कहा था—

“कपड़ा जब तक कटता नहीं,

तब तक किसी काम का नहीं बनता…

शायद इंसान भी ऐसे ही होते हैं।”

उसकी सहेली हँसकर निकल गई थी।

लेकिन सोमा ये बात मज़ाक में कहकर भी

सच बोल गई थी।

वो किताबों से बहुत नहीं पढ़ी थी…

लेकिन ज़िंदगी ने उसे

गहराई से पढ़ा दिया था।

उसे अक्सर लगता—

“पढ़ाई सिर्फ नौकरी के लिए नहीं होती…

दिमाग खोलने के लिए भी होती है।”

शायद इसी वजह से

उसकी बातों में

गाँव की मिट्टी भी थी,

और शहरों से बड़ी समझ भी।

अधूरी पढ़ाई… और पूरा होता हुआ हुनर

सोमा पढ़ना चाहती थी।

बहुत पढ़ना चाहती थी।

वो आगे बढ़ना चाहती थी…

कुछ बनना चाहती थी…

अपने नाम की एक पहचान चाहती थी।

लेकिन कुछ सपनों की किस्मत में

पूरा होना नहीं,

सिर्फ टूटना लिखा होता है।

उसकी पढ़ाई अधूरी रह गई।

मजबूरियाँ इतनी बड़ी थीं कि

इच्छाएँ छोटी पड़ गईं।

किताबों की जगह

उसके हाथों में

सुई, धागा और कपड़ा आ गया।

धीरे-धीरे उसने

सिलाई, कढ़ाई, बुनाई

सब सीख लिया।

वो घर पर रहकर कपड़े सिलती,

थोड़े-बहुत पैसे कमाती,

और उन्हीं पैसों से

अपनी छोटी-छोटी ज़रूरतें पूरी करती।

क्योंकि वो अपने माँ-बाप पर

बोझ बनकर जीना नहीं चाहती थी।

वो अक्सर सोचती—

“अगर मैं घर का बड़ा सहारा नहीं बन सकती,

तो कम-से-कम

अपने खर्चों का बोझ तो खुद उठा सकती हूँ…”

उसकी यही बात

उसे बाकी लड़कियों से अलग बनाती थी।

वो सपने देखती थी…

लेकिन हवा में नहीं उड़ती थी।

वो प्यार चाहती थी…

लेकिन अपने पैरों पर खड़ा होना भी।

वो कहती—

“मुझे बहुत बड़ा कुछ नहीं चाहिए…

बस इतना चाहिए कि

अगर कल कोई साथ छोड़ दे,

तो मैं खुद को संभाल सकूँ।”

एक छोटा-सा सपना… और पूरी दुनिया जितनी खुशी

सोमा का एक छोटा-सा सपना था।

बहुत छोटा…

लेकिन उसके लिए वही पूरी दुनिया था—

एक स्मार्टफोन।

एक ऐसा फोन

जो उसे घर की चारदीवारी से निकालकर

दुनिया से जोड़ दे।

जिससे वो बाहर की दुनिया देख सके…

कुछ सीख सके…

कुछ समझ सके…

और थोड़ा-सा जी भी सके।

कई दिनों की मेहनत,

थोड़ी-थोड़ी बचत,

और अनगिनत इंतज़ारों के बाद

एक दिन उसने अपना सपना पूरा कर लिया।

उसके हाथों में

उसका पहला स्मार्टफोन था।

उस दिन उसकी आँखों की चमक

किसी बच्चे के पहले खिलौने जैसी नहीं थी…

वो चमक थी

एक कैद पंछी को

पहली बार खुला आसमान मिलने की।

उसने फोन को

बस चीज़ की तरह नहीं पकड़ा था—

जैसे किसी ने

उसकी हथेली में

दुनिया का एक छोटा-सा दरवाज़ा रख दिया हो।

फेसबुक… और दुनिया की पहली खिड़की

धीरे-धीरे सोमा ने

फोन चलाना सीख लिया।

व्हाट्सऐप, यूट्यूब, फेसबुक…

उसे सब कुछ

किसी दूसरी दुनिया जैसा लगता था।

गाँव के कई लोगों ने

उसे समझाया—

“लड़कियों को फेसबुक नहीं चलाना चाहिए…”

“आज फोन लिया है, कल बदनामी भी ले लेगी…”

“ज़्यादा उड़ने लगी है…”

लेकिन इस बार

सोमा ने किसी की नहीं सुनी।

क्योंकि उसकी माँ

हमेशा एक बात कहती थीं—

“सुनो सबकी…

लेकिन करो अपने दिल की।”

और इस बार

उसने सच में अपने दिल की सुनी।

उसने फेसबुक अकाउंट बनाया।

शुरू-शुरू में वो डरती थी।

अपनी ही फैमिली और रिश्तेदारों को

रिक्वेस्ट भेजने में भी

उसके हाथ काँपते थे।

क्योंकि वो जानती थी—

इस दुनिया में

लड़कियों की नीयत कम

और उनकी online status ज़्यादा जज की जाती है।

फिर भी…

उसने हिम्मत की।

और धीरे-धीरे

उसकी दुनिया बदलने लगी।

उसे शायरी पसंद थी।

ग़ज़लें पसंद थीं।

दर्द भरी पोस्ट…

अच्छी बातें…

ऐसे अल्फ़ाज़

जो सिर्फ पढ़े नहीं जाते,

महसूस भी होते हैं।

क्योंकि कुछ लोग

चेहरों में सुकून ढूँढते हैं…

और कुछ लोग

लफ़्ज़ों में।

सोमा दूसरी तरह के लोगों में थी।

एक पोस्ट… और दिल का ठहर जाना

एक दिन वो यूँ ही

फेसबुक स्क्रॉल कर रही थी

कि अचानक उसकी उँगलियाँ रुक गईं।

स्क्रीन पर एक पोस्ट थी।

सिर्फ शायरी नहीं…

जैसे किसी टूटे हुए दिल का

खुला हुआ ज़ख्म।

सोमा उसे पढ़ती रही।

एक बार…

फिर दो बार…

फिर तीन बार…

हर बार उसे लगा

जैसे ये अल्फ़ाज़

किसी और के नहीं,

उसी के अंदर से निकले हों।

उसने पोस्ट को लाइक किया।

फिर बहुत देर सोचने के बाद

एक छोटा-सा कमेंट भी किया।

फिर उसके मन में ख्याल आया—

“ये लिखा किसने है?”

उसने प्रोफाइल खोली…

और जैसे ही नाम देखा,

उसकी आँखें हल्की-सी फैल गईं।

“अरे… ये तो हमारे ही रिश्ते के रामजी हैं…”

वो कुछ देर तक

स्क्रीन को देखती रह गई।

उसे यकीन ही नहीं हुआ

कि जो इंसान रिश्ते में

बस एक नाम भर था,

उसके भीतर इतना दर्द,

इतनी तन्हाई,

इतनी गहराई

छिपी हो सकती है।

रामजी — जो बोलते कम थे, महसूस ज़्यादा करते थे

रामजी उन लोगों में से थे

जो जल्दी किसी से जुड़ते नहीं थे।

वो दुनिया के सामने

सामान्य दिखते थे—

काम पर जाने वाले,

कम बोलने वाले,

अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने वाले आदमी।

लेकिन अंदर से…

अंदर से वो बहुत थके हुए इंसान थे।

उनके चेहरे पर

अक्सर कोई शिकायत नहीं होती थी,

लेकिन उनकी पोस्ट पढ़कर

लगता था जैसे

उनके भीतर

कई अधूरी रातें रहती हैं।

वो उन लोगों में से थे

जो ज़्यादा बोलकर

अपना दर्द हल्का नहीं करते…

बस

लिखते हैं।

और लिखते-लिखते

धीरे-धीरे खुद में उतरते जाते हैं।

उन्हें लोगों की बातें कम,

उनके लहजे ज़्यादा याद रहते थे।

उन्हें अक्सर लगता था कि

दुनिया सुनती सब है…

समझती बहुत कम है।

शायद इसीलिए

उनके शब्दों में

इतना दर्द था।

और शायद इसी वजह से

सोमा का दिल

उनकी तरफ खिंचने लगा।

एक रिक्वेस्ट… और दिल की पहली धड़कन

सोमा का मन किया

कि वो उन्हें फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दे।

लेकिन उँगलियाँ स्क्रीन पर जातीं…

और फिर रुक जातीं।

“कहीं उन्हें अच्छा न लगे…”

“कहीं उन्होंने एक्सेप्ट न किया तो?”

“कहीं वो गलत न समझ लें…”

एक बार नहीं…

हज़ार बार उसने सोचा।

लेकिन दिल का क्या करें…

वो बार-बार

उसी प्रोफाइल पर लौट आता था।

आख़िरकार

एक दिन उसने काँपते हाथों से

उन्हें रिक्वेस्ट भेज ही दी।

और दो दिन बाद…

रिक्वेस्ट एक्सेप्ट हो गई।

उस पल उसके चेहरे पर

जो मुस्कान आई,

वो छोटी थी…

लेकिन सच्ची थी।

लाइक… कमेंट… और एक अनकहा रिश्ता

अब सोमा रोज़

उनकी पोस्ट पढ़ने लगी।

रामजी लगभग हर दिन

कुछ न कुछ पोस्ट करते—

कभी शायरी,

कभी दर्द,

कभी तन्हाई,

कभी ऐसी बातें

जो सीधे दिल में उतर जाती थीं।

और शायद ही कोई ऐसी पोस्ट जाती

जिस पर सोमा का

लाइक या कमेंट न होता।

धीरे-धीरे

ये सिलसिला

आदत बन गया।

और फिर…

एक दिन

चैट शुरू हो गई।

शुरुआत बहुत साधारण थी—

“नमस्ते…”

“कैसी हैं?”

“पोस्ट अच्छी लगी…”

लेकिन जिंदगी की

सबसे बड़ी कहानियाँ

अक्सर बहुत छोटे

“हैलो” से शुरू होती हैं।

“तुम कौन हो?” — पहचान का पहला धागा

रामजी असल में

सोमा को पहचानते ही नहीं थे।

उन्हें बस इतना याद था

कि रिश्तेदारी में

कोई “सोमा” नाम की लड़की है।

लेकिन चेहरा…

उन्हें याद नहीं था।

उन्होंने चैट में लिखा—

“शायद हम मिले हैं…

लेकिन मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा।”

सोमा ने बहुत समझाया,

लेकिन जब बात न बनी

तो उसने अपनी एक फोटो भेज दी।

फोटो देखते ही

रामजी कुछ पल के लिए

बिल्कुल खामोश हो गए।

वो तस्वीर

सिर्फ एक चेहरा नहीं थी…

वो जैसे

सादगी में लिपटी हुई

एक ऐसी मासूमियत थी

जो दिल पर धीरे से असर करती है।

उसके चेहरे पर

कोई बनावट नहीं थी,

लेकिन एक अजीब-सी सफ़ाई थी।

उसकी आँखें

जैसे कुछ कहती थीं।

और उसकी हल्की-सी मुस्कान

बहुत देर तक

स्क्रीन पर ठहरी रहती थी।

रामजी ने पहली बार महसूस किया—

सोमा सिर्फ अच्छी नहीं…

बहुत खूबसूरत है।

लेकिन उससे भी ज़्यादा

उन्हें ये महसूस हुआ कि

उसके चेहरे में

एक अजीब-सी सच्चाई है।

उन्होंने हँसकर लिखा—

“अच्छा… अब थोड़ा-थोड़ा याद आया।

चलो, फिर कभी सामने मिलेंगे

तो ठीक से पहचान लेंगे।”

लेकिन सच तो ये था…

पहचान अब

चेहरे से नहीं,

दिल से शुरू हो चुकी थी।

बातों का सिलसिला… और दिल का खुलना

उस दिन के बाद

उनकी बातें

रुकने का नाम ही नहीं लेती थीं।

असल में

बातों की शुरुआत चाहे रामजी करते हों,

लेकिन उन्हें चलाना

सोमा को आता था।

वो छोटी-सी बात को भी

इतना प्यारा मोड़ दे देती

कि फिर घंटों चैट चलती रहती।

कभी वो अपने घर की बातें बताती,

कभी पड़ोस की,

कभी बचपन की,

कभी गाँव की,

और कभी बिना वजह

बस यूँ ही बोलती चली जाती।

लेकिन उसकी बातों की सबसे अलग बात ये थी कि

वो सिर्फ बातें नहीं करती थी…

वो हर बात में

एक सोच छोड़ जाती थी।

एक बार उसने अचानक लिखा—

“आपको नहीं लगता…

हमारे यहाँ लड़कियों को समझने से पहले

उन पर पहरा लगा दिया जाता है?”

रामजी कुछ पल तक

उस मैसेज को देखते रहे।

फिर उन्होंने पूछा—

“तुम ये सब इतना सोचती हो?”

सोमा ने जवाब दिया—

“सोचती नहीं…

महसूस करती हूँ।”

उस एक जवाब ने

रामजी को भीतर तक छू लिया।

उन्हें पहली बार लगा—

ये लड़की

सिर्फ हँसने-बोलने वाली नहीं है…

ये समझती भी है।

रामजी को पहली बार लगा — कोई उनकी चुप्पी पढ़ रहा है

रामजी कम बोलते थे।

बहुत कम।

अक्सर उनके जवाब बस इतने होते—

“हाँ…”

“ठीक है…”

“आप बताइए…”

“अच्छा…”

लेकिन सोमा को

उनकी चुप्पी से डर नहीं लगता था।

वो उसे पढ़ने लगी थी।

अगर रामजी का जवाब

थोड़ा छोटा होता,

तो वो तुरंत पूछ बैठती—

“आज आप पहले जैसे नहीं लग रहे… सब ठीक है?”

अगर वो देर से reply करते,

तो वो कहती—

“आप busy हैं या फिर दिल कहीं और है?”

और अगर वो बस

“ठीक हूँ” लिख देते,

तो सोमा कहती—

“जो लोग सिर्फ ‘ठीक हूँ’ लिखते हैं न…

अक्सर वही सबसे कम ठीक होते हैं।”

रामजी उस message को

बहुत देर तक देखते रह जाते।

क्योंकि दुनिया ने अक्सर

उनकी बातों को सुना था…

लेकिन सोमा

उनकी चुप्पी पढ़ लेती थी।

शायद यहीं से

रामजी का दिल

धीरे-धीरे

उसकी तरफ पूरी तरह झुकने लगा।

पहली कॉल — सिर्फ 19 मिनट 11 सेकंड… लेकिन असर उम्रभर का

एक दिन रामजी ने

हिम्मत करके कहा—

“अगर तुम चाहो…

तो हम फोन पर बात कर सकते हैं?”

सोमा खुद भी यही चाहती थी…

बस कह नहीं पा रही थी।

उसने हल्की-सी झिझक के साथ

“हाँ” कह दिया।

और फिर…

उन दोनों के बीच

पहली बार कॉल लगी।

फोन की स्क्रीन पर

सिर्फ नाम चमक रहा था…

लेकिन दोनों के दिलों में जैसे

पूरा आसमान धड़क रहा था।

कुछ सेकंड तक

दोनों तरफ सिर्फ खामोशी थी।

फिर बहुत धीमी, काँपती हुई आवाज़ में

रामजी ने कहा—

“हैलो…”

सोमा ने भी

उतनी ही धीमी आवाज़ में जवाब दिया—

“जी…”

बस…

इतना-सा शब्द था।

लेकिन उसी “जी” में

शरमाहट भी थी,

मुस्कान भी थी,

और एक नया रिश्ता भी।

धीरे-धीरे बात आगे बढ़ी।

पहले गाँव की बातें हुईं…

फिर रिश्तेदारी की…

फिर फेसबुक की…

फिर पोस्ट की…

सोमा ने पूछा—

“आप इतना दर्द कैसे लिख लेते हैं?”

रामजी कुछ पल चुप रहे।

फिर बोले—

“कुछ बातें लिखी नहीं जातीं…

बस दिल से निकल आती हैं…”

ये सुनकर

सोमा कुछ सेकंड के लिए

बिल्कुल शांत हो गई।

उसने बहुत धीरे से कहा—

“आपके अल्फ़ाज़ पढ़कर

ऐसा लगता है जैसे

आप बहुत कुछ सह चुके हैं…”

रामजी ने बात टालनी चाही—

“छोड़ो… तुम अपनी बताओ।”

और बस…

यहीं से कॉल का रंग बदल गया।

अब सोमा खुलने लगी थी।

वो अपने सिलाई-कढ़ाई के काम की बातें बताती,

बीच-बीच में हँस पड़ती,

कभी पड़ोस की कोई बात,

कभी सहेलियों की,

कभी बचपन की कोई शरारत।

फिर अचानक बोली—

“आपको पता है, लोग सोचते हैं सिलाई बस मशीन चलाना होता है…

पर असली मुश्किल तो उससे पहले शुरू हो जाती है।”

रामजी मुस्कुराए—

“कैसे?”

सोमा बोली—

“अरे… सुई में धागा डालना ही कभी-कभी जान ले लेता है!”

दोनों हँस पड़े।

फिर वो बिना रुके बोलती चली गई—

“कभी धागा बार-बार फट जाता है…

कभी सुई का छेद दिखता ही नहीं…

कभी रोशनी कम हो तो आँखें दुखने लगती हैं…

और कभी-कभी तो मैं गुस्से में धागे को ही डाँटने लगती हूँ…”

रामजी हँस पड़े—

“धागे को डाँटती हो?”

सोमा भी हँसी—

“हाँ! जैसे वो जान-बूझकर अंदर नहीं जा रहा हो!”

फिर कुछ पल बाद

उसकी आवाज़ थोड़ी नरम हो गई।

वो बोली—

“सच बताऊँ…

कभी-कभी लगता है

सुई में धागा डालना भी ज़िंदगी जैसा है…”

रामजी चुप हो गए।

“मतलब?”

सोमा ने धीरे से कहा—

“मतलब…

बहुत कोशिश करो,

फिर भी हर चीज़ पहली बार में नहीं जुड़ती…”

बस…

इतना सुनकर

रामजी के दिल में

कुछ बहुत गहराई से उतर गया।

उन्हें लगा—

ये लड़की सिर्फ बातें नहीं करती…

ये छोटी-छोटी चीज़ों में भी

ज़िंदगी ढूँढ लेती है।

और शायद

उसी पल

उनका दिल

उसकी तरफ थोड़ा और हार गया।

कॉल खत्म हुई।

कुल समय — 19 मिनट 11 सेकंड।

सिर्फ 19 मिनट 11 सेकंड।

लेकिन उन 19 मिनट 11 सेकंडों में

ना जाने कितनी धड़कनें थीं,

कितनी झिझकें,

कितनी मुस्कानें,

कितनी अनकही शुरुआतें।

वो कोई बहुत लंबी बातचीत नहीं थी…

लेकिन उसके बाद

दोनों के दिल

पहले जैसे भी नहीं रहे।

कब प्यार हुआ… किसी को पता ही नहीं चला

धीरे-धीरे

फोन कॉल्स बढ़ने लगीं।

अब बातें सिर्फ

19 मिनट 11 सेकंड तक नहीं रुकती थीं…

अब तो कभी-कभी

दो-दो, तीन-तीन घंटे भी

पता ही नहीं चलता था।

रामजी बहुत कम बोलने वाले इंसान थे।

लेकिन सोमा…

सोमा तो जैसे

बातों की पूरी किताब थी।

वो उनसे कुछ पूछती,

फिर खुद ही उसका जवाब भी बताने लगती,

फिर उसी से जुड़ी दूसरी बात छेड़ देती,

और फिर हँसते-हँसते

उन्हें भी बोलने पर मजबूर कर देती।

धीरे-धीरे

रामजी ने महसूस किया कि

वो अब पहले जैसे नहीं रहे।

अब वो पहले से ज़्यादा

बोलने लगे थे।

क्योंकि सोमा

सिर्फ उनसे बात नहीं करती थी…

वो उनकी खामोशी को भी

अपनेपन से खोल देती थी।

और शायद

यहीं से

रामजी का दिल

पूरी तरह हार गया था।

उन्हें उससे प्यार हो चुका था।

बहुत गहरा…

बहुत सच्चा…

बहुत चुपचाप…

उधर सोमा भी अब

खुद को रोक नहीं पा रही थी।

उसे भी रामजी से

बात करना अच्छा लगने लगा था।

वो भी उनकी तन्हाई,

उनके दर्द,

उनके लफ़्ज़ों,

और उनकी चुप्पियों में

खुद को महसूस करने लगी थी।

दोनों के दिलों में प्यार था…

लेकिन होंठों पर अब भी

खामोशी थी।

“I Love You” — और बरसों से रुका हुआ एक पल

एक रात…

बातों-बातों में…

रामजी ने आखिरकार

अपने दिल की बात कह दी।

बहुत धीरे…

बहुत सच्चाई से…

“सोमा… I Love You…”

बस इतना सुनना था कि

सोमा की आँखों से

आँसू बहने लगे।

जैसे बरसों से रुकी हुई बारिश

एक ही पल में

टूटकर बरस पड़ी हो।

उसका दिल चाहा

कि वो दौड़कर उन्हें गले लगा ले…

और जी भरकर रो ले…

लेकिन दोनों के बीच

सिर्फ दूरी नहीं थी…

मजबूरी भी थी।

रामजी ने बहुत प्यार से कहा—

“अब तुम मेरी जिंदगी हो…

तुम्हें रोना नहीं है।

हमेशा हँसना है…

क्योंकि तुम्हारी हँसी में ही

मेरी दुनिया बसती है…”

उस रात के बाद

दोनों सिर्फ अपने नहीं रहे…

एक-दूसरे की आदत,

राहत,

और दुनिया बन गए।

रातें अब सिर्फ उन्हीं की थीं

दिन में सोमा

फैमिली के बीच रहती थी,

इसलिए खुलकर बात नहीं कर पाती थी।

लेकिन रात…

रात अब उसकी अपनी थी।

जैसे ही सब सो जाते,

वो चुपके से फोन उठाती

और फिर पूरी रात

रामजी से बातें करती।

कई बार उनके पास

बोलने के लिए कुछ खास नहीं होता था…

फिर भी बात चलती रहती थी।

क्योंकि जब दिल जुड़ जाएँ,

तो शब्दों की ज़रूरत

कम पड़ जाती है।

कई-कई रातें

तीन-तीन, चार-चार बजे तक गुजर जातीं…

और दोनों को पता ही नहीं चलता।

रामजी को लगता था

जैसे वो अब पहली बार

सच में जी रहे हैं।

और सोमा…

उसे लगता था

जैसे उसे कोई ऐसा मिल गया है

जो उसकी बातों से नहीं थकता,

बल्कि उन्हीं बातों में जीता है।

एक तस्वीर… और मुस्कुराने की वजह

रामजी को

सोमा की मुस्कान बहुत पसंद थी।

उन्होंने एक दिन कहा—

“सोमा…

रोज सुबह अपनी एक फोटो भेजा करो…

एक अच्छी-सी स्माइल के साथ…”

सोमा हँस पड़ी…

लेकिन फिर उसने

ये आदत बना ली।

अब हर सुबह

रामजी के फोन पर

सोमा की मुस्कुराती हुई तस्वीर आती।

और रामजी के लिए

अब सुबह की शुरुआत

चाय से नहीं,

सोमा के चेहरे से होने लगी थी।

एक छोटी-सी आदत… और एक अनजाना डर

धीरे-धीरे

सोमा ने रामजी पर

अपना पूरा भरोसा करना शुरू कर दिया था।

वो अब उन्हें

अपनी तस्वीरें भी भेजने लगी थी।

लेकिन हर तस्वीर भेजने के बाद

वो एक बात ज़रूर कहती—

“किसी को दिखाइएगा मत…”

रामजी हँसकर कहते—

“पागल हो क्या?

तुम्हारी चीज़ें अब मेरी अमानत हैं…”

सोमा ये सुनकर मुस्कुरा देती,

लेकिन उसके भीतर कहीं

एक छोटा-सा डर

हमेशा जिंदा रहता था।

क्योंकि वो गाँव की लड़की थी—

और गाँव की लड़कियाँ

सिर्फ बदनामी से नहीं डरतीं…

वो गलत नज़र से भी डरती हैं।

वीडियो कॉल… और पहली नज़र का पूरा असर

एक दिन रामजी ने कहा—

“सोमा…

मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ।

अगर possible हो तो वीडियो कॉल?”

सोमा कैसे मना करती…

जब वो खुद भी

उन्हें देखना चाहती थी।

उस शाम लगभग 5:30 बजे,

सोमा ने काँपते हाथों से

वीडियो कॉल किया।

स्क्रीन जली…

और दूसरी तरफ

रामजी का चेहरा सामने था।

कुछ पल के लिए

दोनों जैसे ठहर गए।

रामजी बस उसे

देखते रह गए।

सोमा ने हल्की-सी झेंप के साथ पूछा—

“क्या देख रहे हैं ऐसे?”

रामजी धीरे से बोले—

“सच बताऊँ?”

“हूँ…”

“तुम बहुत अच्छी लग रही हो…”

सोमा मुस्कुरा दी।

रामजी फिर बोले—

“और तुम्हारी आवाज़…

उसका तो कोई जवाब ही नहीं।

तुम बोलती हो तो लगता है

जैसे कानों में मिश्री घुल रही हो…”

सोमा खिलखिला कर हँस पड़ी।

उसकी हँसी में

एक अजीब-सा जादू था।

रामजी को लगा—

ये लड़की सिर्फ खूबसूरत नहीं…

ये जीता-जागता सुकून है।

और उसी पल

उन्होंने मन ही मन कसम खा ली—

“अब चाहे जो हो जाए…

मैं इस लड़की को कभी नहीं छोड़ूँगा…”

एक पल… और सब कुछ बदल गया

उनकी वीडियो कॉल अभी चल ही रही थी कि

अचानक रामजी के ऑफिस में काम करने वाला

एक सहकर्मी

बिना दस्तक दिए

उनकी केबिन में घुस आया।

रामजी कुछ समझ पाते,

उससे पहले ही

उसकी नज़र

फोन की स्क्रीन पर पड़ गई।

उसने हँसते हुए,

छेड़ने वाले अंदाज़ में जोर से कहा—

“अरे!

आप तो कह रहे थे बिल्कुल अच्छी नहीं लग रही…

लेकिन ये तो बहुत खूबसूरत है!”

बस…

इतना सुनना था कि

सोमा के चेहरे का रंग उड़ गया।

उसकी आँखों की चमक

एक ही पल में बुझ गई।

उसके दिमाग में

एक साथ बहुत-सी बातें कौंध गईं—

वो हर बार तस्वीर भेजने के बाद

जो कहती थी—

“किसी को दिखाइएगा मत…”

रामजी का वो हँसकर कहना—

“तुम्हारी चीज़ें अब मेरी अमानत हैं…”

और अब…

एक अनजान आदमी की आवाज़

उसी स्क्रीन के सामने

जहाँ वो अपना दिल लेकर बैठी थी।

उस एक पल में

उसे ऐसा लगा

जैसे उसका भरोसा

किसी ने सबके सामने

खोलकर रख दिया हो।

उसकी उँगलियाँ काँप गईं।

चेहरे की मुस्कान

एकदम से गायब हो गई।

उसने कुछ कहने की कोशिश भी नहीं की…

बस

तुरंत कॉल काट दी।

और उधर…

रामजी के हाथ जैसे

वहीं के वहीं रुक गए।

उन्हें एक सेकंड के लिए

समझ ही नहीं आया

कि अभी हुआ क्या है।

लेकिन अगले ही पल

उनके दिल ने समझ लिया था—

कुछ बहुत बुरा टूट चुका है।

गलतफ़हमी… जो प्यार से ज़्यादा तेज़ निकली

कॉल कटते ही

सोमा के मैसेज आने शुरू हो गए—

“आप भी बाकी लोगों जैसे ही निकले…”

“मुझे लोगों को दिखा रहे थे?”

“मैंने आप पर भरोसा किया था…”

“आपने मेरी इज़्ज़त को मज़ाक बना दिया…”

“अब मैं आपसे कभी बात नहीं करूँगी…”

उसके हर शब्द में

सिर्फ गुस्सा नहीं था…

उसमें डर भी था,

चोट भी थी,

और सबसे बढ़कर—

टूटे हुए भरोसे की चीख थी।

क्योंकि एक गाँव की लड़की के लिए

अपनी तस्वीर,

अपनी हँसी,

अपना चेहरा,

और अपना दिल

किसी को सौंप देना

सिर्फ प्यार नहीं होता…

वो यकीन होता है।

और आज

सोमा को लग रहा था

कि वही यकीन

उसकी आँखों के सामने

टूट गया है।

रामजी बार-बार

समझाने की कोशिश करते रहे—

“सोमा… जैसा तुम सोच रही हो वैसा कुछ भी नहीं है…”

“वो मेरा सहकर्मी है…”

“उसकी आदत है मज़ाक करने की…”

“मैंने तुम्हें किसी को नहीं दिखाया…”

“तुम मेरी बात समझो…”

लेकिन उस समय

सोमा कुछ सुनने की हालत में नहीं थी।

वो लगातार बोले जा रही थी…

जो भी

 उसके दिल में था,

जो भी डर उसके भीतर

बरसों से दबा था,

जो भी असुरक्षा

उसने कभी किसी से नहीं कही थी—

सब कुछ

वो उसी रात

रामजी पर उंडेलती जा रही थी।

और इधर…

रामजी चुप थे।

क्योंकि कुछ लोग

बहुत बोलकर

अपना दर्द हल्का कर लेते हैं…

लेकिन कुछ लोग…

बस चुप रहकर

अंदर ही अंदर टूटते रहते हैं।

रामजी उन्हीं लोगों में से थे।

उन्हें सफाई देना नहीं आता था।

उन्हें बस इतना आता था कि—

अगर सामने वाला समझ ले तो ठीक…

वरना चुप रहो।

लेकिन आज…

पहली बार

उन्हें लगा कि

जिसे उन्होंने

दिल की गहराइयों से अपनाया था…

जिसकी हँसी को उन्होंने

अपनी सुबह बना लिया था…

जिसकी आवाज़ में उन्होंने

सुकून ढूँढ लिया था…

वो उनसे

सिर्फ एक गलत पल की वजह से

दूर जा सकती है।

उनकी उँगलियाँ फोन पर थीं…

आँखें स्क्रीन पर…

लेकिन दिमाग सुन्न हो चुका था।

एक छोटी-सी गलतफ़हमी

उनकी पूरी दुनिया

उनकी आँखों के सामने

छीनती जा रही थी…

और वो…

बस उसे जाते हुए

देख रहे थे।

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