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जो चले गए,मेरे भगवान थे।।
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गांव से शहर लाये थे हर समय बने रहते साये थे हर समस्या का समाधान थे जो चले गए ,मेरे भगवान थे।। मदद में रहते तत्पर थे साल के भले ही सत्तर थे मेरी जिंदगी के अरमान थे जो चले गए,मेरे भगवान थे। जिंदगी कितनो की बनाये थे जाने कितने चूल्हों की आग थे फूंकते मुर्दो में जान थे जो चले गए,मेरे भगवान थे। मिटाकर लकीरें बदनसीबी की क़िस्मत नई लिखकर आये थे देते मोड़ दरिया ऐसे चटटान थे जो चले गए,मेरे भगवान थे।। टूट गयी थी नींद उस रात को तड़प रहे थे नयन बरसात को न समझ पाया क्यूँ हम परेशान थे जो चले गए,मेरे भगवान थे।। रामानुज'दरिया'
ये दौलत..................कुंवारी जगह से।
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पढ़ न पाया मैं तुम्हारी वज़ह से सताया है तूने मुझे कुंवारी जगह से। हर इक नजरों से गिराया है तूने अपनों से पराया बनाया है तूने समय भी समय से हार गया तेरी वज़ह से फीका हर त्योहार गया। माँ भी मेरी उदास रहा करती थीं हफ़्ते में व्रत दो चार किया करती थीं अब ओ भी नाराज़ रहा करती हैं छोड़ मुझको आंसुओं के साथ रहती हैं। पर दुआएँ करती हैं हर समय हर जगह से ये सब कुछ हुआ बस तुम्हारी वज़ह से। बहन आती अब नइहर नहीं बापू जाते अब शहर नहीं रूठी बहन है भाई जान से रूठ गया अनाज मेरे खलिहान से। रामानुज"दरिया"
दिलकश
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उड़ती जुल्फों ने आज शाम कर दी सरेआम हाल-ए-दिल तमाम कर दी। बिन थके हर पहलू को सलाम कर दी बोलने की अदा ने बैठना हराम कर दी यूं तो खामोसी बहुत डसती है सनम तेरी बक बक ने जीना हराम कर दी। भुला भी देता तुझे तो कैसे सनम तूने तो दिल-ए-दरिया गुलाम कर दी। लिखी गमों की दास्ताँ ऐसी खुदा ने हमने त्याग सुखो चैन आराम कर दी इक चाहत थी की चाहूं तुझे मैं सनम चाहत ने ही सरे-आम बदनाम कर दी मैं मुहब्बत के आखिरी पड़ाव में आ गया उसने आज ही आगाज़-ए-अंजाम कर दी। रामानुज 'दरिया'