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कदम से कदम मिला कर चलें।

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मेरा जूता है जापानी।

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यूं नजदीकियों का बढ़ना अच्छा नहीं।

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जब से त्यागा है तुमने मुझको प्रिय।

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जा जीते जी तुझको नरक मिले।

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असत्य पर सत्य तो जीत ही जाएगा

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असत्य पर सत्य तो जीत ही जाएगा मगर सत्य में असत्य को कब मिटाओगे  तन का रावण तो जल ही जाएगा मगर मन के रावण को कब तुम जलाओगे। तिनका रक्षा मां की करे कब तलक खुद को राक्षसों से कब तक बचायेंगी  या तो भेजो तुम अपने हनुमान को या बताओ धनुष धारी तुम कब आओगे   

हुस्न और इश्क़ मिटटी तले गाड़ दी हमने।

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हुस्न और इश्क़ मिटटी तले गाड़ दी हमने बिन तेरे जीने की आदत डाल ली हमने। मचलते हुऐ फूलों से, मेरा कोई वास्ता नहीं  कांटों संग जिंदगी जीने की ठान ली हमने। तुम दिन को अगर रात कहोगी रात कहेंगे हम इस पागलपन से थोड़ी सी निज़ात ली हमने। जिंदगी मिली थी मुझे खुदा के रहम ओ करम से तेरे नफ़रती अंदाज से उसे भी काट ली हमने। एक दो तीन ............. सात जनम का वादा छि:, इसी जनम में खड़ी कर ली खाट हमने। फिर लिखेंगे कभी की जिंदगी क्या होती है अभी तो कलम की स्याह ही चाट ली हमने।  

टूटना और फिर बिखर जाना।

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टूटना और फिर बिखर जाना नीयती का है सब ताना बाना एक चेहरे पे नजरों का ठहर जाना आसां नहीं दिल का बच्चा हो जाना ये कोई मदारी का खेल नहीं प्यारे मोहब्बत करना और फना हो जाना    

मन हार गया दरिया उसको मनाते मनाते

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ऐसी चांद का मै अब तो दीवाना नहीं।

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बोरी में जायेंगे या डरम में जायेंगे

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क्या आपकी आलोचना हो रही है

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Open Marriage kya hai

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कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे

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उल्टी चप्पल सीधी करने में

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विषय चिंता का भी और चिंतन का भी

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समाज का दोगला चरित्र

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कलयुग का कुरूक्षेत्र

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किसी का टाइम पास मत बना देना।

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बातों का अहसास मत बना देना मुझे किसी का खास मत बना देना बस इतना रहम करना मेरे मालिक  किसी का टाइम पास मत बना देना। जान कह कर जो जान देते थे ओ चले गये अनजान बन कर फितरत किसकी क्या है क्या पता बारी आयी तो चले गये ज्ञान देकर। अब होंसला दे खुदा की निकाल सकूं खुद को भी किसी तरह संभाल सकूं आसां नहीं रूह का जिस्म से जुदा होना बगैर उसके जीने की आदत डाल सकूं। हमने ओ भयावह मंजर भी देखा है किसी को टूटते हुये अंदर से देखा है अब किसी के लिये क्या रोना धोना हमने तो अब खुद में सिकंदर देखा है।  

उनका भी इक ख्वाब हैं।

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 उनका भी इक ख्वाब हैं ख्वाब कोई देखूं मैं उनसे उन्ही की तरह लच्छेदार बात फेकूं मैं। टिकाया है जिस तरह सर और के कंधे पर चाहती है सर अपना किसी और कांधे टेकूं मैं। शौक था नये नजारों का यूँ तो सदा ही देखि ओ चाहत है उसकी कि  कहीं और नयन सेकूं मैं। दिल से उसे निकाल कर बचा हूँ कितना खुद में वक्त मिले गर खुदा, तो  खुद को खुद से देखूं मैं। समझदारी प्यार को भी व्यापार बनाती है प्रेम मिले भी अगर शिशु की भांति देखूं मैं। बेशक़ तेरे चाहने वालों की भीड़ बहुत भारी है गर दिल से उतर गयी तो लानत है मेरे व्यक्तित्व पर जो इक बार पलट कर देखूं मैं।