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मन हार गया दरिया उसको मनाते मनाते

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ऐसी चांद का मै अब तो दीवाना नहीं।

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बोरी में जायेंगे या डरम में जायेंगे

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क्या आपकी आलोचना हो रही है

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Open Marriage kya hai

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कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे

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उल्टी चप्पल सीधी करने में

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विषय चिंता का भी और चिंतन का भी

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समाज का दोगला चरित्र

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कलयुग का कुरूक्षेत्र

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किसी का टाइम पास मत बना देना।

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बातों का अहसास मत बना देना मुझे किसी का खास मत बना देना बस इतना रहम करना मेरे मालिक  किसी का टाइम पास मत बना देना। जान कह कर जो जान देते थे ओ चले गये अनजान बन कर फितरत किसकी क्या है क्या पता बारी आयी तो चले गये ज्ञान देकर। अब होंसला दे खुदा की निकाल सकूं खुद को भी किसी तरह संभाल सकूं आसां नहीं रूह का जिस्म से जुदा होना बगैर उसके जीने की आदत डाल सकूं। हमने ओ भयावह मंजर भी देखा है किसी को टूटते हुये अंदर से देखा है अब किसी के लिये क्या रोना धोना हमने तो अब खुद में सिकंदर देखा है।  

उनका भी इक ख्वाब हैं।

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 उनका भी इक ख्वाब हैं ख्वाब कोई देखूं मैं उनसे उन्ही की तरह लच्छेदार बात फेकूं मैं। टिकाया है जिस तरह सर और के कंधे पर चाहती है सर अपना किसी और कांधे टेकूं मैं। शौक था नये नजारों का यूँ तो सदा ही देखि ओ चाहत है उसकी कि  कहीं और नयन सेकूं मैं। दिल से उसे निकाल कर बचा हूँ कितना खुद में वक्त मिले गर खुदा, तो  खुद को खुद से देखूं मैं। समझदारी प्यार को भी व्यापार बनाती है प्रेम मिले भी अगर शिशु की भांति देखूं मैं। बेशक़ तेरे चाहने वालों की भीड़ बहुत भारी है गर दिल से उतर गयी तो लानत है मेरे व्यक्तित्व पर जो इक बार पलट कर देखूं मैं।

बस रोने को ही जी चाहता है।

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  बस  रोने  को   ही   जी   चाहता  है जाने  क्या खोने  को  जी  चाहता है।  बचा   नही   कुछ    भी    अब   मेरा जाने किसका होने को जी चाहता है।  लिपट  कर  रोती  है  ये रात भी रात भर जाने किसके संग सोने को जी चाहता है।  दौलत खूब कमाया उदासी और तन्हाई भी जाने  किस   खजाने  को   जी  चाहता  है।  इर्ष्या  द्वेष  कलह  फ़सल  सारी  तैयार  है जाने कौन सा बीज बोने को जी चाहता है।  ओढ़  ली   कफ़न   खुद   से   रूबरू   होकर जाने कौन सी चादर ओढ़ने को जी चाहता है।

तेरे बिन जिंदगी बसर कैसे हो।

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  जो  अमृत  है  ओ  ज़हर  कैसे  हो तेरे  बिन  जिंदगी  बसर  कैसे  हो। ख़्वाबों के अपने  सलीक़े अलग  हैं उजालों में  इनका  असर कैसे  हो। इंसानियत  प्रकृति  की  गोद  में  हो वहां  कुदरत   का   कहर  कैसे  हो। घरों की पहचान बाप के नाम  से हो वह  जगह   कोई   शहर   कैसे  हो। पीने  के  योग्य  भी  न  रह  गया  हो वह  जल स्रोत  कोई  नहर  कैसे  हो। खुदगर्ज़ी की बांध से जो बंध गया हो उस सागर में फिर कोई लहर कैसे हो। ढल  गया  हो  दिन  हवस की दौड़ में फिर उसमें सांझ या दो पहर कैसे हो।

Happy kiss day.

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  अच्छे को अच्छा,  बुरे को बुरा कौन कहेगा चा पलूसी के जहां में अब खरा कौन कहेगा। हथेली चूम मोहब्बत -ए- इबारत लिखते थे हवस के दौर में बसंत को हरा कौन कहेगा। सतरंगी  जीवन  में  मरने  के  तरीके  बहुत हैं इश्क  में  मरने  को  अब  मरा  कौन  कहेगा। बदन की भूख में पलने वाले इश्क का  दौर है माथा चूम के,शब्द ,प्यार से भरा,कौन कहेगा। दिखावा ने असल दुनिया से बेदख़ल कर दिया अब  फीके  पकवान  को  सरा  कौन  कहेगा। थोड़े में लिबास ज्यादा ओढ़ने का रस्म है साहब अब  ज्यादा  हैसियत  को  ज़रा  कौन  कहेगा।

इस  क़दर  भी  न   सताया  करो।

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  पास  आकर  न  दूर  जाया  करो इस  क़दर  भी  न   सताया  करो। ख़्वाबों   के    दरमियां   फासले  हैं न  ख्वाबों  से  तुम  घबराया  करो। जिंदगी की  असली  कमाई  तुम हो मेरी  कमाई  से न मुकर जाया करो। दिल  दे  दिये  हो तो भरोसा रख्खो हर  जगह  न  हाथ आजमाया करो। गम-ए-जिंदगी  जीना तो आसां नहीं मग़र थोड़ी थोड़ी तो सुलझाया करो सभी को आईने दिखाना जरूरी नहीं गिरेबां में अपने भी झांक जाया करो। गर हो गया हूँ रुस्वा तो थोड़ा ध्यान दो कभी कभार तो हमें भी मनाया करो। बेसक नहायी हो तुम नीली झील में वक्त रहते केशुओं को सुखाया करो। सवांरती फिरती हो जिन ज़ुल्फों को उन जुल्फों में न हमें उलझाया करो। ये  इबादत के दिन  हैं तो सुनो दरिया खुदा  की रहमतों में मुस्कुराया करो। अपनी आदतों से क्यूं बाज नहीं आती मु आंख तुम इतना न मटकाया करो।

जहां कल था वहीं आज हूँ।

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 जहां कल था वहीं आज हूँ मैं  ही  रस्म-ओ-रिवाज़  हूँ।  लड़की  की  आबरू हूँ  मैं और मनचलों पर गाज  हूँ।  बुर्का  और   घूंघट  भी  हूँ मैं  ही  जलता  समाज  हूँ।  मैं  मोहब्बत  और ताज हूं मोहब्बत  को मोहताज़ हूँ।   फसल   और   किसान  हूँ मैं  ही  गांव  का अनाज हूँ। संस्कारों    का   गिद्ध    हूँ जिम्मेदारियों  का  बाज हूँ। बसपा   का   प्रशासन   हूँ मैं  सपा  का  गुंडा  राज हूँ। कर्मों   का    योगी   हूँ   मैं अयोध्या  का  राम राज हूँ। सपनों    का     सूरज    हूँ मैं  ही   डूबता   जहाज़  हूँ। खामोशी   का   समंदर   हूँ मैं   वक्ता   चाल   बा...

नाज़ुक दिल है ज्यादा मत दुखाना।

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  भूले   से   भी   जान  भूल  मत  जाना नाज़ुक  दिल  है  ज्यादा  मत  दुखाना। आ  गया  हूँ  मैं धनवानों की कतार में जान  तू  ही  है  मेरा  असली खजाना। प्यार  तुमसे  है,  बस  यही  था  कहना आता  नहीं  मुझे  ज्यादा  बातें  बनाना। चाह  है  मिलने  की  हम  मिलेंगे जरूर रोक सकेगा  कब  तक  बेरहम जमाना। ख्वाबों का कोई शहर  होता नहीं दरिया बस  प्यार  से  प्यार  का  ध्यान लगाना। आ जाये आँशुओँ  का सैलाब जो कभी इक बार सनम की आंखों में डूब जाना। अनजान था इश्क़ की गुमनाम गलियों से आता  नहीं  मुझे खुद का वज़ूद मिटाना। बिरह  का  दिन  ऐसा भी होता है दरिया भूल  गयी  ओ  हाथों  में  मेंहदी लगाना। जीने  का अंदाज बदल दिया  कोरोना ने सीख  लिया  हमने  नयनों से मुस्कुराना। महसूस  कर...

जिसने ख़ुद को मिटा दिया मेरे खातिर।

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  मैं लड़ता ही कब तलक उससे आख़िर जिसने ख़ुद को मिटा दिया मेरे खातिर। उसकी तो मजबूरियां  थी बिछड़ने की इल्ज़ाम  बेवफ़ा  का लिया मेरे खातिर। बेशक   था  मैं   मोहब्बत   का  दरिया तरस गया हूँ  इक बूंद प्यार के खातिर। जिस्म-फ़रोसी से निकाल कर लायी है उससे ज्यादा उसका दिमाग था शातिर। चलो  अब  इक   राह   नयी   बनाते  हैं कुछ और नहीं ,अपने प्यार  के ख़ातिर। दुनिया  का  एक  सच ये  भी  है 'दरिया' भेंट   होती   रहती   है  पेट  के  ख़ातिर। सेहत  गिरती   रही  मेरी  दिन  -  ब - दिन पीछे  भागता  रहा   मैं  स्वाद  के ख़ातिर। हर   कोई   तुम्हारा    हम   दर्द  है   दरिया तरसोगे  नहीं   चुटकी  भर  नमक ख़ातिर। उलझ  जाते  हैं  सारे  रिस्ते  सही...

मेरी   सुबह   की  सलाम   ले  जाना।

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  मेरी   रातों   की   नींद   उड़ाने   वाले मे री   सुबह   की  सलाम   ले  जाना। खामोशियों   के  अनछुये   रिश्तों   से इश्क़  का  तकिया  कलाम  ले  जाना। जा रही  हो  तो  सुनो  इक बार सनम साथ,अपने दिल का निज़ाम ले जाना। तेरे  इशारों पे  नाचता  फिरता था जो साथ अपने जोरू का गुलाम ले जाना।