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पहली मोहब्बत।
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पहली मोहब्बत नयनों का पहली बार मिलना फिर मिलकर बिछड़ना हथेलियों का बालों में मचलना जुल्फों का खुद से बिखरना। आसान नहीं होता। साथ मे धीरे - धीरे चलना फिर चुपके से छुप जाना अचानक से सामने आकर फिर गले से लिपट जाना। आसान नहीं होता। जाते - जाते बाय कर जाना Byke कैम्पस में भूूूल जाना रात भर बाय को गुनगुनाना सुबह इंतजार में लग जाना। आसान नहीं होता। पंखुड़ियों को पकड़ कर हिलाना छत की बालकनी मे...
शबनमी ओंठ अंगारे बरसाने लगे।
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छुप - छुप कर बतियाता ही रहता हूँ मैं लगता है बगावत पे उतर आया हूँ मैं। मेरे कर्मो का आईना देखो 'दरिया' अपने ही विनाश पर उतर आया हूँ मैं। नजदीकियां बढ़ी थी विषम परिस्थिति में हालात बदलते , औकात में उतर आया हूँ मैं। सम्भाल कैसे पाओगे ए - ख़ुदा हमें जब गिरने पे ही उतर आया हूँ मैं। हो सकता है कचहरी लग जाये कल खिलाफ़ लिखने पे जो उतर आया हूँ मैं। अब तो तरक्की ही पक्की है साहब जब चाटुकारिता...
हिंदी से हिन्दू- हिंदुस्तान है।
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सुबह भी तुझसे होती तुझ संग गुजरती शाम है हे मेरी मातृ जननी तुझे शत - शत प्रणाम है। सांसों में है तू बसी तुझ संग ही जुबान है यूं ही तू फूले - फले तुझ में ही हिंदुस्तान है। तेरी उपस्थिति से ही मेरी लेखनी का सम्मान है मिसाल दूं क्या मैं जब तू ही विधा की चटटान है। लिख गये भारतेन्दु जी शुक्ल जी का भी मान है नारा इतिहास का यही हिंदी से हिन्दू-हिंदुस्तान है।
एक घटना जिसने देश को झकझोर का रख दिया था।
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ओडिशा के एक अस्पताल की ह्रदयविदारक घटना जिसमें दीनू मांझी नामक आदिवासी की पत्नीक tv के कारण मृत्यू हो जाती है और वह अपनी पत्नी को कंधों पर उठाकर चल देता है और 12 km तक जाता है,इसके बाद ही उसको एम्बुलेंस मुहैया करायी जाती है जो हमारे देश की अव्यवस्था का आईना पेश करती है।जिस घटना ने पूरे देश को झकझोर के रख दिया। ओ लाश नहीं आखिरी आस थी लाचार व्यवस्था की जिंदा अहसास थी मजबूत कंधे की ओ कहानी है कांपते मेरे रूह की जवानी है हर सख्स के लवों की आवाज़ है सरेआम मरती इंसानियत आज है बहुतों ने देखा बहुतों ने सोंचा होगा हर किसी ने व्यवस्था को कोसा होगा तस्वीर देख कर होंगे हम जिंदा नहीं इस पर इंसानियत होती शर्मिंदा नहीं फुट -फुट कर रोया किया कितना गिला होगा जनाजा लेकर जब प्रियतम का चला होगा। कितनी भयावह दुःखद रही ओ घड़ी होगी जब शौहर के कंधे पर चली पगडंडी होगी। यह तस्वीर क्या बताने के लिए काफी नहीं कि हम ज़मीर बेंचने में करते न इंसाफी नहीं आ...
पत्ता कट गया तो क्या हुआ।।
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दबा ली न उंगलियां दांतों तले कट गया तो क्या हुआ।। पहन कर नहीं चले थे हेलमेट चालान कट गया तो क्या हुआ।। कहे थे कि न लड़ाओ पतंग डोर कट गया तो क्या हुआ।। कहा था इसरो विक्रम साथ रहना संपर्क कट गया तो क्या हुआ।। त्योहार था अपना बकरीद का बकरा कट गया तो क्या हुआ।। उम्र तड़प उठी जब जाने को टिकट कट गया तो क्या हुआ।। निभा ली न सारी जिम्मेदारियां चढा फट गया तो क्या हुआ।। फॉल इन लव में मज़ा तो आया जेब कट गया तो क्या हुआ।। माल ही जब गलत बना दिया पगार कट गया तो क्या हुआ।। जवान बीबी को छोड़ प्रदेश गये पत्ता कट गया तो क्या हुआ।।
ऐसा मंजर हो गया था।
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तुम सोंच नहीं सकते दरिया कि ओ कितना करीब हो गया पैंतरे ही ऐसे लगाता था ओ कि उसका सफल तरक़ीब हो गया । था चार दिनों का अनुभव मात्र चालीस दिनों को मात देता कुछ इस कदर संभाला उसने कि हर विभाग का नसीब हो गया । रख सकते हो कब तक दरिया तुम गुमराह करके किसी को तेरे काम का लहज़ा बता रहा था जाने का वक्त कितना करीब हो गया उसके प्रवेश मात्र से ही ऐसा मंजर हो गया था हर किसी के लिये हर कोई चुभता खंजर हो गया था। माना कि तुम कहना चाहते हो किसी की चुगली नहीं कि उसने सच्चाई ये है कि कोई बचा नहीं जिसके पीछे उंगली नहीं कि उसने यूं तो छा गये थे गुरु आसमां में बादल की तरह पर बहते देर न लगी आंसुओं संग काज़ल की तर...
नयना तुम्हारे।
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टूट कर बिखरने लगता हूँ संभालते हैं कंगना तुम्हारे पी लून मैं कितना भी सनम प्यास बुझाते हैं नयना तुम्हारे। रूठ कर चल देता हूँ बुला लेते हैं अरमां तुम्हारे गिर जांऊ किसी की नजर में उठा लेते हैं नयना तुम्हारे। सागर की बात क्या करूँ 'दरिया' हैं सावन के सहारे डूबी नहीं हैं कस्तियां वहां जहां केंवट हों नयना तुम्हारे। यूं तो भंवरे होँसियार बहुत हैं चूस लिए हैं रस यौवन के सारे पर बच न सके आज तलक तीर चलाये हों जब नयना तुम्हारे।
Happy Teacher's Day.
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महकती धरती जिसके दम पर और जगमाता आसमान है चुनी यह राह है जिसने उनको सौ-सौ बार प्रणाम है मौजूद हजार राहें हैं यूं तो जीवन निर्वाह खातिर फिर भी उठा लिया वीड़ा समाज के उत्थान खातिर। दम घुटता है जब संस्कारों का बनकर प्रचार आता है गुरु बेशक कभी लौ नहीं बनता मगर तेल का क़िरदार निभाता है गुरु। पेंड़ बनकर खड़ा नहीं होता मगर बीज का पोषण करता है गुरु जाता नहीं चल कर कहीं मगर हर राह दिखा देता है गुरु। बुझते दीपक में तेल बनकर डूबते जीवन में मेल बनकर भटके राही के जीवन मे चलती ट्रेन बनकर आते हैं गुरु सभ्यता को संभाल कर रखना संस्कारों को जीवित रखना मचलते फूल से बच्चों को बनाकर इन्शान रखना आसान नहीं होता।
कुछ इस कदर हमने मोहब्बत का हिसाब लिख दी।
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तेरे खुलते अधरों पे गीत बंद अधरों पे प्रीत लिख दी बताऊँ क्या तुझे मैं सनम हारकर तुझे तेरी जीत लिख दी। तेरी खुली जुल्फों का बादल मटकते नयन की काज़ल लिख दी तेरी इक इक भंगिमाओं पर होते हृदय को पागल लिख दी। इक - इक शब्द पर तेरे हमने इक - इक किताब लिख दी कुछ इस कदर हमने मोहब्बत का हिसाब लिख दी। तेरी हिरनी की चाल उस पर गाल छूने का मलाल लिख दी मिलती नजरों पर होते अपने ख्यालों को हलाल लिख दी।
तुझ पे जां लुटाता रहूं।
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तू रोये चीखे और चिल्लाये मैं उसका आनंद उठता रहूं इतना भी हरजाई नहीं कि तुझ पे जां लुटाता रहूं। तू नाचे गाये और बजाये मैं उस पर तान लगाता रहूं कभी बजे जो पायल पाओं में मैं उस पर जां लुटाता रहूं। है तू तितली मन के मेरे सुबह - शाम रहती घेरे है नहीं दिन बचपन के डोरी बांध पूंछ में तेरे दिन भर मैं उड़ाता रहूं।
मैं कंफ्यूज़ डॉट कॉम हूँ।
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कर नहीं पाता सार्थक एक भी काम हूँ मैं कंफ्यूज़ डॉट कॉम हूँ सुरुआत बेहतर करता हूँ कि कुछ बेहतर हो जाये पर दिमाग के साथ ही करने लगता आराम हूँ मैं कंफ्यूज़ डॉट कॉम हूँ। जिंदगी भी पेपर हो गयी निकलते काम ही फाड़कर देता डाल कूड़ेदान हूँ मैं कंफ्यूज़ डॉट कॉम हूँ। बीएससी फिर एमएससी मए फिर आई टी आई शौकीन की पढ़ाई से लगाया डिग्रीयों का जाम हूँ मैं कंफ्यूज़ डॉट कॉम हूँ लगा दो दांव पर मोहब्बत-ए-जिंदगी अपनी छुड़ा कर हाथ महबूबा शिश्कते हुये कहती है चलूं तेरे साथ कैसे अपने घर का सम्मान हूँ मैं कंफ्यूज़ डॉट कॉम हूँ। रो रो के कहती है ओ जब चले भी आओ न घर अब सोंचता हूँ कि अब चला जाऊं पर अपने मालिक का गुलाम हूँ मैं कंफ्यूज़ डॉट कॉम हूँ। रामानुज 'दरिया'
घुड़की से डर जाऊं ऐसा मैं शायर नहीं हूँ।
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विनम्र हूँ कोमल हूँ पर कायर नहीं हूँ घुड़की से डर जाऊं ऐसा मैं शायर नहीं हूँ। सरल हूँ सहज़ हूँ पर लायर नहीं हूँ जो बोले, ओ लिखूँ ऐसा मैं शायर नहीं हूँ। सच को सच झूठ को झूठ लिखूँ तेरे गुलाबी लबों पर थिरकती सुबह की धूप लिखूँ तू जो चाहे सिर्फ़ ओ लिखूँ आशिक हूँ तेरा तेरे से हायर नहीं हूँ। रूठ जाऊं, छूट जाऊं तेरी बोलियों से टूट जाऊं समझ इतनी है, कि तू अपना है वर्ना आग का दरिया हूँ इक बूंद से बुझ जाऊं ऐसा मैं फायर नहीं हूँ। घुड़की से डर जाऊं ऐसा मैं शायर नहीं हूँ।
बेशक तुम तनहा रह जाओगी।
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गर इश्क़ किसी और से करोगी और नयन किसी और से मिलाओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी। सिखा कर पाठ मुहब्बत का छोड़ कर साथ चली जाओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी। खिला कर पान इश्क का लगा कर चूना चली जाओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी। पहन कर हार हीरों का गले किसी और को लगाओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी। पहन कर कपड़े अर्धनग्न गलत विचार को ठहराओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी। वादा सात जन्मों का मोहब्बत में गहराई सात दिन में नपॉओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी। मिला कर मन किसी और से गोलाई तन की नपाओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी। भुला कर कुर्बानियां माँ - बाप की धज़्ज़ियाँ इज़्ज़त की उड़ाओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी। बना कर परी रक्खा था जिसने कभी उसी के लिये अभिशाप बन जाओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी।
कोयल कहती मैं भी। यादों के संग-संग ।
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ईंट - ईंट बजते हैं, पत्ती फूल बनकर आई है ऐसा लगता है ITI में कोई परी सी उतर आई है। ये तो साहब की अंगड़ाई है….….……............... अघ्यापक भी मुस्कुराते हैं बच्चे भी खिल - खिलाते हैं कर्मचारियों का तो क्या कहना इनकी क़िस्मत भी तो चमक आयी है। ये तो साहब की अंगड़ाई है.......….. बच्चे हैं सब समय से आते जूता मोजा भी पहन के आते सब तो अब हैं ड्रेस में आते बिल्ला भी खूब लटकाई है। ये तो साहब की अंगड़ाई है... पेंड़ पौधे हैं रंगे जाते ईंट पत्थर भी गंगा नहाते नालियों की बात न पूंछो इनकी भी तो खूब सफाई है। ये तो साहब की अंगड़ाई है.. अघ्यापक हैं सब समय से आते अनुशासन का पाठ सिखाते नौ बजे गेट बंद हो जाता फिर पांच ही बजे विदाई है। ये तो साहब की अंगड़ाई है..... गर इक दिन नहीं आते तो एप्लिकेशन हैं लाते गर हफ़्ते बीत गये तो मेडिकल के संग में आते महीनों की बात न पूंछो इसमें नामों की खूब कटाई है ये तो साहब की अंगड़ाई है......…......... अध्यापक क्या क्या गुर सिखाते भेली को हैं गुरु बनाते जब भी...
वक्त और मैं।
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वक्त और मैं कभी साथ न चल सका खेर और बेर कभी साथ न पल सका। जब वक्त था तो मैं नहीं अब मैं हूँ पर वक्त नहीं। मंजिल दिखी तो रास्ता न मिला रास्ता दिखा तो मंजिल न मिली। चलना चाहा तो पांव न मिले पांव मिले तो चल न सका । जिससे हाथ मिला उससे दिल न मिला जिससे दिल मिला उससे हाथ न मिला। जिसे पलकों पे बिठाया उसने कभी समझा नहीं जिसने समझा उसको कभी बिठा न सका। जब उम्र थी तब पायल नहीं अब पायल है पर उम्र नहीं। सजना थे तब सज न सके अब सजे तो सजना नहीं। जब नयन मिले तब काजल नहीं अब काजल है तो नयन नहीं। चमन थी तब बहार न आयी अब बहार आयी तो चमन नहीं। जब संग थी पत्नी तो सेज़ नहीं अब सेज़ है पर संग पत्नी नहीं। जिसका मैं हुआ ओ कभी मेरा नहीं जो मेरा हुआ उसका कभी में नहीं। शौक दुपट्टे का था तो जोबन नहीं अब जोबन है पर दुपट्टा नहीं। ओ आयी मिलने तब तक मैं पहुंचा नहीं पहुंचा भी मैं तब तक ।ओ चली गयी। जब भूख थी तब निवाला नहीं अब निवाला है पर भूख नहीं। जिंदगी थी तब कोई तारीफ़ नहीं अब तारीफ़ है पर जिंदगी नहीं। ...