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जिसको जाना था ओ चले गये।

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साथ लेकर सारे शिकवे गिले गये जिसको जाना था ओ चले गये। बात पुरानी हवेली की करते हो साहब नीव नई बखरियो के अब तो हिल गये। शिकायत अपनों से ही रहती है सदा कौंन गैरों के लिपटने गले गये। चमन खाली नहीं होता 'दरिया' यहाँ कितनों के माली बदले गये। मज़ाल क्या बहार की जो न आये हर कली जो चमन के खिल गये।

इश्क कर लें हम दोंनो।

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अमावस्या की मिलन फिक्स कर लें हम दोनों चलो इक बार फिर से इश्क कर लें हम दोनों। अय्याशियों का शिल- शिला जारी रहे बस चलो एक साथ दो जिस्म कर लें हम दोंनों। मिलन की आरज़ू है बस संगमरमरी बदन की रेशमिया वाला फिर से किस कर लें हम दोनों। कटती तो है पर सदाबहार जैसी नहीं है जवानी को भी इसमें मिक्स कर लें हम दोनों। गुलाबी ओंठ, हंसी जिस्म और सुरमयी आंख आओ रात में ही आज सिक्स कर लें हम दोंनो।

तुम जीत गयी मुझसे।

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तुम जीत गयी मुझसे मन हर गया खुद से था तो बहुत कुछ कहना आवाज़ निकली न मुह से। तेरे लिए मन तड़पा आंखें रोयी बहुत दिल से रोशन तो बहुत सारा किया अंधेरा मिटा न अपने तल से बिखर गया आंगन अपना जब तू बढ़ गयी हद से प्रेम तो बस इबादत है खुद का फर्क नी, कितनी छोटी है कद से कोशिश करना तो कोई गुनाह नहीं जरूरी नहीं, मिट जाये बुराई जग से। हर कोई झुक जाये मेरे सामने छुई ऊंचाई इतनी नहीं कद से इक तरफ़ा न होती गर मोहब्बत यकीं मानो लिपट जाती तन से। हर साँस में आश छुपी है उसकी वर्ना निकल जाती मेरे बदन से। मैं उम्र भर राहें सजाता रहूंगा ओ तरसएगी मुझे हज़ारों जतन से। मैं बंज़र हो गया खुदा तेरे दिन के इस तपन से। देख आज सावन भी जा रहा है बिना उसकी एक मिलन से ओ बदसूरत न थी इतना जितना हो गयी औरों की जलन से। ये ज़र्रा ज़र्रा एक दिन कराहेगा उसकी बिछुड़न जैसी मिलन से।

कोई सपना न रहा/

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टूट कर बिखरा हूँ कि कोई सपना न रहा हो चुके सब पराये कोई अपना न रहा। छोड़ कर गांव शहर क्या आ गये किराये के जीवन में घर का अंगना न रहा। पर कटे परिंदे के उसे उड़ना न रहा नसीब बदली ऐसी कि  हाथ का कंगना न रहा। करें क्या सिंदूर का जब सजना ही न रहा धुल गये श्रृंगार कि सजना न रहा। हया कराहने लगी बदन का नपना न रहा ओढ़ ली मजबूरी की चादर कोई रंक या रजना न रहा।         "दरिया"

यादों के संग संग

दूर रह कर भी पास हो गए थे जाने कैसे इतना खास हो गए थे। रह गये कुछ लम्हे यादों के लिए जी कर जिन्हें हम साथ हो गए थे। वक्त है ,कि फासले ही फासले है वक्त था,साथ में दो हाथ हो गए थे।

मेरे पास चली आना।

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सावन जब घिर - घिर आये और कोयल भी गीत सुनाये मेरे पास चली आना। तारे जब दीपक बन जायें और आँखे भी मोती बरसायें मेरे पास चली आना। केशव जब जब लहरायें अंगड़ाई बेकाबू हो जाये मेरे पास चली आना। पायल में झंकार आ जाये और होंट गुलाबी हो जायें मेरे पास चली आना। चेहरे पर रौनक आ जाये आंखे मधुशाला हो जायें मेरे पास चली आना। रातें जब उधार हो जायें दिन भी लाचार हो जाये मेरे पास चली आना। बिस्तर लड़ - लड़ जाये तकिया भी नींद चुराये मेरे पास चली आना। भले साल पचपन हो जाये याद बचपन की आ जाये मेरे पास चली आना।

जिंदगी ऐसी दुशवार हो गयी।

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जिंदगी ऐसी दुशवार हो गयी जैसे सावन में कुवार हो गयी। पार होती भी तो कैसे भंवर से नैय्या अपनी तो पतवार हो गयी। इज़्ज़त इतनी दे दी उसे योग्यता अपनी ही गवांर हो गयी। छड़ी के बदले भुजा दी जिसे उसके आगे शरीर बेकार हो गयी। आंखों से ओझल जिसे होने न दिया उसी के आगे लाचार हो गयी। "दरिया"

तू रुलाएगा जरूर।

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मुझे मालूम था तू रुलाएगा जरूर हंसते - हंसते एक दिन जाएगा जरूर। धमक - गरज और लड़ना - झगड़ना मालूम था ये दिन आएगा जरूर। तिनका तिनका मिलाकर सजाया था जो नम आंखों से उसे छोड़ कर जायेगा जरूर। बारिश हो न हो घटा छायी रही मालूम था नीर तू बहायेगा जरूर। था करीब तू जरूरत से ज्यादा परछाई की तरह तू सताएगा जरूर। "दरिया"

आउंगी जरूर।

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उसने कहा है मैं आउंगी जरूर रौनक चेहरे की लौटाऊंगी जरूर। इस जनम में तड़प लो मेरे लिये अगले जनम तेरी हो जाऊंगी जरूर। तन से मैं हो गयी किसी और की भले मन से तेरी होकर आउंगी जरूर। छू न सकेगा तू जिस्म को मेरे पर रूह में तुझे बसाउंगी जरूर। देखा है ख्वाब जो तूने साथ मेरे अगले जनम में पूरा कराउंगी जरूर। रखी है शर्त जो मोहब्बत की तूने दो पल तेरे साथ बिताउंगी जरूर। भले चाहत है तुझे साथ अकेले की पर जी भर के तुझे मैं सताउंगी जरूर। "दरिया"

बदन सेनेटाइज कर रखा है

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मैंने खुद को कितना कस्टमाइज कर रखा है चेहरे पे मास्क और बदन सेनेटाइज कर रखा है तरसाना छोड़, अब तो आ जाओ न सनम मैंने पूरा दिल अपना फिल्टराइज़ कर रखा है यकीं नही होता तो देख लो बचपन का स्कूल चौदह दिन से  जहां क्वारंटाइन कर रखा है।

लाजबाब हो तुम।

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मेरे इश्क की आखिरी किताब हो तुम               लाजवाब से भी ज्यादा लाजवाब हो तुम।                 मालूम, तारीफ़ सुनने को बेताब हो तुम                मेरी शायरी के हर शब्द का ख्वाब हो तुम।                झकझोर देगी तुम्हे ये खामोसी भी मेरी               मेरे बेचैन सवालों का भी जवाब हो तुम।                 उतार लूँ चांद को जमीं पे गर कहो तुम                मेरे दिल पर हुकूमत-ए- नवाब हो तुम।                लौट भी आओ कि दिल बहुत उदास है            'दरिया' की रोजी रोटी का हिंसाब हो तुम।                                  "दरिया"

मुझे इश्क हो गया।

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तेरे लंबे - लंबे बालों से और सुर्ख गुलाबी गालों से मुझे इश्क हो गया। होंठों की कचनारों से और हिरनी सी चालों से मुझे इश्क हो गया। तेरे जुल्फों की घटाओं से और नयनों की मटकाओं से मुझे इश्क हो गया। तेरे व्यभिचारिणी हालातों से और संग में पीते - खातों से मुझे इश्क हो गया। ग्रीन टी के प्यालों से नाभी और कपालों से मुझे इश्क हो गया। तेरे संग चांदनी रातों से और मीठी - मीठी बातों से मुझे इश्क हो गया। तेरे बदलते अंदाज़ों से नये - नये आगज़ों से मुझे इश्क हो गया। तेरे टूटते होंसलों से बढ़ते गलत फैंसलों से मुझे इश्क हो गया। "दरिया"

पर्यवारण हमारा है।

हवा का सहारा है नदिया का किनारा है सच पूछो तो ये पर्यावरण हमारा है। पहाड़ों को तोड़ कर धाराओं को मोड़ कर जो हुनर हमने दिखया है परिणाम है उसी का आज, बच्चा - बच्चा बेसहारा है। ज़हर घोला है हमने नाला नदियों में खोला है हमने विज्ञान पढ़ पढ़ कर रसायनों का अविष्कार किया हमने परिणाम उसी का है हर इंशान आज बेचारा है। काश दादा की बात माने होते एक पौधा अपने हिस्से में लगाये होते कोने कोने में आज हरियाली होती समृद्धिवान ये पर्यावरण हमारा होता।

मन हरा होता।

हरा- भरा यदि धरा होता न चिंता हमें ज़रा होता। साख - साख मुस्कुराते पत्तियों का मन हरा होता। दोस्ती अपनी कायम होती बातों का गर खरा होता। सरकार योगी की न होती तो खेत इतना चरा न होता। चेताया समय से चीन होता संकट इतना बरा न होता। दोहन प्रकृति का न होता जो ज़र्रा-ज़र्रा इतना जरा न होता। 'दरिया'

पर्दा हटा रखना।

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पलकें  भिगो  कर  सींचा  है  हमने हो  सके  वतन को हरा भरा रखना। वर्षा  नहीं  सकते हो दो फूल मुझ पर पत्थर फेंकने से खुद को बचा रखना। बीच  की  दूरियों को इतना सज़ा रखना हो सके हथेलियों को सफा-सफा रखना शौक  नहीं लाठियां  भांजने  का मुझे हो  सके  पलकों  से  पर्दा हटा रखना। न  दे  सको  दान  एक फूटी कौड़ी भी राष्ट्र  हित  में  तिज़ोरी  खुला  रखना।               'दरिया'

#पालघर

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बेशर्म  बेहया  निकम्मी  हो  गयी पुलिस पालघर की दल्ली हो गयी। घुटने  टेक  दिए  हैवानों  के आगे रक्षक कैसे इतनी डल्ली हो गयी। अज्ञानता  इतनी  पसर गयी वहॉं समझ  सकी  न  भाषा  संतों की संतों को पीट - पीट कर मार डाला मानवता कैसे इतनी निठल्ली हो गयी। #पालघर

बस अकेला रहा।

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तन्हाइयों  का  लगा  ऐसा  मेला  रहा मैं  जहां  भी  गया  बस  अकेला रहा। शक थी तो बस अपनी काबिलियत पर मैं  ईमानदार  गुरु  का  भ्रस्ट चेला रहा। लोगों ने  चाहा  भी  तो कुछ इस कदर व्यहार  अपनों  का  भी  सौतेला  रहा। ख़ौफ़ खंजरों से कभी खाया नहीं हमने रूप प्यार का ही जहरीला सपेला रहा। सेहत  सुधरे  भी  तो  कैसे  सनम का फलों  में  खाता  ही  सिर्फ़ केला रहा। गर चाहती खुशियां पास आने को कभी खुदा   मारता   गमों का बस ढेला रहा।

दिया

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एक   दिया  क्या  जला   दिया जग  से  अंधेरा   मिटा   दिया। कहता  था जो कहता रह गया बढ़कर हमने फ़र्ज़ निभा दिया। वेशक एक दिये से फर्क नि पड़ता एक-एक कर धरा जगमगा दिया। कोना  कोना यहां रोशन हो गया दिये ने अपना वज़ूद दिखा दिया। दिये से एकता का संदेश बता दिया कुछ इस कदर कोरोना भगा दिया।

आस्तीन सांप की।

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उनको हो जाने दो राख की जो परवाह न करे आपकी। यकीं मानो , मिट गया है ओ जिसने सुनी न माँ बाप की। बात मानों तुम पाल लो नाग को पर न पालो आस्तीन सांप की। कर लो कुछ सद्कर्म भी प्यारे वर्ना असर न करेगी हरि जाप की बस चाह लो एक बार जो सनम मिट जाएंगी दूरियां दिलों के नाप की। मिल जाये जिंदगी उसे भी बच्चा गोद ले लो किसी अनाथ की। 'दरिया'

अदभुत नज़ारा।

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मैं तो बस यूं ही बालकनी में खड़ा था लेकिन अचानक से मेरी नजर जब उस तरफ गई तो मैं चौंकन्ना स रह गया ओ अदभुत नजारा जो मैं शायद पहली बार देख रहा था ओ भी इतना करीब से ।ओ मूड बना रहा था या बना रही थी यह तो मैं ठीक से कन्फर्म नहीं हूँ लेकिन एक एक स्टेप जो एक एक करके खोल रहा था और उससे बनने वाली ओ छबि क्या कहना जिसे भगवान ने इतना सारा कुछ दिया हो उसको फिर किस चीज़ की कमी हो सकती है भला।अपनी मस्ती में झूम झूम कर प्रकृत के भविष्य का वर्णन जिस तरह कर रहा था कोई कवि या लेखक क्या खाक ऐसा कर सकता है और जो एक बार घूम जाता तो पूरा मौसम झूम उठता ये कोई कहने वाली बात नही है इसका जीता - जागता उदाहरण है कि शाम को means अभी खूबसूरत रिम - झिम बारिस धरा के बदन को भिगो रही थी। मौसम का यह पूर्वानुमान शायद इससे बेहतर कोई लगा सकता हो अगर हम गूगल और विज्ञान की बात न करें तो। एक मोर जो जुल्फ रूपी अपने पंख को जिस मस्ती में लहराता और नाच रहा था देख के मेरा ही नहीं बल्कि वहाँ मौजूद सभी लोग मूरीद हो गए। टक - टकी लगा के सब बस उसे ही देख रहे थे जो खुले दिल से मौसम को न्योता दे रहा था। यह वही मोर है साहब जिसे भारत सरक...