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कुछ इस कदर हमने मोहब्बत का हिसाब लिख दी।

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तेरे खुलते अधरों पे गीत बंद अधरों पे प्रीत लिख दी बताऊँ क्या तुझे मैं सनम हारकर तुझे तेरी जीत लिख दी। तेरी खुली जुल्फों का बादल मटकते नयन की काज़ल लिख दी तेरी इक इक भंगिमाओं पर होते हृदय को पागल लिख दी। इक - इक शब्द पर तेरे हमने इक - इक किताब लिख दी कुछ इस कदर हमने मोहब्बत का हिसाब लिख दी। तेरी हिरनी की चाल उस पर गाल छूने का मलाल लिख दी मिलती नजरों पर होते अपने ख्यालों को हलाल लिख दी।

अपने बाप की दौलत पर।

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बहुत आसान है करना घमंड अपने  बाप  की  दौलत  पर गर   छोड़  दिया  जाए  नंगा उम्र  भर   खरीद  न  पाओगे एक  भी  चढ़ी अपने दम पर। बात करते हो हुकूमत करने की भविष्य  की  सल्तनत  पर हमेशा  सपने  नहीं  आते जिंदगी  के  धरातल  पर । तुम  ही  इतिहास  लिखोगे भविष्य के कोरे कागज़ पर जो  चल  न सके आज तक खुद अपने  पैरों के दम पर ।

तुझ पे जां लुटाता रहूं।

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तू रोये चीखे और चिल्लाये मैं उसका आनंद उठता रहूं इतना  भी   हरजाई   नहीं कि तुझ पे जां लुटाता रहूं। तू  नाचे  गाये  और  बजाये मैं  उस पर तान लगाता रहूं कभी बजे जो पायल पाओं में मैं  उस  पर  जां लुटाता रहूं। है  तू  तितली  मन  के  मेरे सुबह  -  शाम  रहती  घेरे है  नहीं  दिन  बचपन  के डोरी  बांध  पूंछ   में   तेरे दिन  भर  मैं  उड़ाता रहूं।

मैं कंफ्यूज़ डॉट कॉम हूँ।

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कर नहीं पाता सार्थक एक   भी   काम   हूँ मैं कंफ्यूज़ डॉट कॉम हूँ सुरुआत बेहतर करता हूँ कि कुछ बेहतर हो जाये पर  दिमाग  के साथ  ही करने  लगता  आराम  हूँ मैं कंफ्यूज़ डॉट कॉम  हूँ। जिंदगी भी पेपर हो गयी निकलते काम ही फाड़कर देता  डाल   कूड़ेदान   हूँ मैं कंफ्यूज़ डॉट कॉम  हूँ। बीएससी फिर एमएससी मए  फिर  आई  टी आई शौकीन   की  पढ़ाई  से लगाया डिग्रीयों का जाम हूँ मैं कंफ्यूज़  डॉट  कॉम  हूँ लगा   दो   दांव   पर मोहब्बत-ए-जिंदगी अपनी छुड़ा कर हाथ महबूबा शिश्कते हुये  कहती है चलूं   तेरे  साथ   कैसे अपने घर का सम्मान हूँ मैं कंफ्यूज़ डॉट कॉम हूँ। रो रो के कहती है ओ जब चले भी आओ न घर अब सोंचता हूँ  कि  अब चला जाऊं पर अपने मालिक का गुलाम  हूँ मैं  कंफ्यूज़  डॉट  कॉम  हूँ। रामानुज 'दरिया'

घुड़की से डर जाऊं ऐसा मैं शायर नहीं हूँ।

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विनम्र हूँ कोमल हूँ पर  कायर  नहीं हूँ घुड़की से डर जाऊं ऐसा मैं शायर नहीं हूँ। सरल  हूँ  सहज़ हूँ पर  लायर  नहीं हूँ जो बोले, ओ लिखूँ ऐसा मैं शायर नहीं हूँ। सच   को      सच झूठ को झूठ लिखूँ तेरे गुलाबी लबों पर थिरकती सुबह की धूप लिखूँ तू जो  चाहे सिर्फ़  ओ   लिखूँ आशिक  हूँ     तेरा तेरे से हायर नहीं हूँ। रूठ जाऊं,   छूट  जाऊं तेरी बोलियों से टूट जाऊं समझ इतनी है, कि तू अपना है वर्ना आग का दरिया हूँ इक बूंद से बुझ जाऊं ऐसा मैं फायर नहीं हूँ। घुड़की से डर जाऊं ऐसा मैं शायर नहीं हूँ।

बेशक तुम तनहा रह जाओगी।

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गर इश्क़ किसी और से करोगी और नयन किसी और से मिलाओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी। सिखा कर पाठ मुहब्बत का छोड़ कर साथ चली जाओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी। खिला कर पान इश्क का लगा कर चूना चली जाओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी। पहन कर हार हीरों का गले किसी और को लगाओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी। पहन कर कपड़े अर्धनग्न गलत विचार को ठहराओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी। वादा सात जन्मों का मोहब्बत में गहराई सात दिन में नपॉओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी। मिला कर मन किसी और से गोलाई तन की नपाओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी। भुला कर कुर्बानियां माँ - बाप की धज़्ज़ियाँ इज़्ज़त की उड़ाओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी। बना कर परी रक्खा था जिसने कभी उसी के लिये अभिशाप बन जाओगी बेशक तुम तनहा रह जाओगी।

कोयल कहती मैं भी। यादों के संग-संग ।

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ईंट - ईंट बजते हैं, पत्ती फूल बनकर आई है ऐसा लगता है ITI में कोई परी सी उतर आई है। ये तो साहब की अंगड़ाई है….….……............... अघ्यापक भी मुस्कुराते हैं बच्चे भी खिल - खिलाते हैं कर्मचारियों का तो क्या कहना इनकी क़िस्मत भी तो चमक आयी है। ये तो साहब की अंगड़ाई है.......….. बच्चे हैं सब समय से आते जूता मोजा भी पहन के आते सब तो अब हैं ड्रेस में आते बिल्ला भी खूब लटकाई है। ये तो साहब की अंगड़ाई है... पेंड़ पौधे हैं रंगे जाते ईंट पत्थर भी गंगा नहाते नालियों की बात न पूंछो इनकी भी तो खूब सफाई है। ये तो साहब की अंगड़ाई है.. अघ्यापक हैं सब समय से आते अनुशासन का पाठ सिखाते नौ बजे गेट बंद हो जाता फिर पांच ही बजे विदाई है। ये तो साहब की अंगड़ाई है..... गर इक दिन नहीं आते तो एप्लिकेशन हैं लाते गर हफ़्ते बीत गये तो मेडिकल के संग में आते महीनों की बात न पूंछो इसमें नामों की खूब कटाई है ये तो साहब की अंगड़ाई है......…......... अध्यापक क्या क्या गुर सिखाते भेली को हैं गुरु बनाते जब भी...
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स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। भले चाह कर जिस्म को और प्रेम को तन लिखूं पर कबूल दुआ हो इतनी मेरी कलम जब भी चले तो वतन लिखूं।। लाख जतन कर,बचा ले गर बचा सके चीन पाकिस्तान तू मसूद अजहर को पर हथियार उठे जब भी इस बार मसूद संग पूरा पाकिस्तान खत्म लिखूं। रामानुज "दरिया"

वक्त और मैं।

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वक्त और मैं कभी साथ न चल सका खेर और बेर कभी साथ न पल सका। जब वक्त था तो मैं नहीं अब मैं हूँ पर वक्त नहीं। मंजिल दिखी तो रास्ता न मिला रास्ता दिखा तो मंजिल न मिली। चलना चाहा तो पांव न मिले पांव मिले तो चल न सका । जिससे हाथ मिला उससे दिल न मिला जिससे दिल मिला उससे हाथ न मिला। जिसे पलकों पे बिठाया उसने कभी समझा नहीं जिसने समझा उसको कभी बिठा न सका। जब उम्र थी तब पायल नहीं अब पायल है पर उम्र नहीं। सजना थे तब सज न सके अब सजे तो सजना नहीं। जब नयन मिले तब काजल नहीं अब काजल है तो नयन नहीं। चमन थी तब बहार न आयी अब बहार आयी तो चमन नहीं। जब संग थी पत्नी तो सेज़ नहीं अब सेज़ है पर संग पत्नी नहीं। जिसका मैं हुआ ओ कभी मेरा नहीं जो मेरा हुआ उसका कभी में नहीं। शौक दुपट्टे का था तो जोबन नहीं अब जोबन है पर दुपट्टा नहीं। ओ आयी मिलने तब तक मैं पहुंचा नहीं पहुंचा भी मैं तब तक ।ओ चली गयी। जब भूख थी तब निवाला नहीं अब निवाला है पर भूख नहीं। जिंदगी थी तब कोई तारीफ़ नहीं अब तारीफ़ है पर जिंदगी नहीं। ...

सीमित प्रेम ( Limited Love)

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एक लड़का है जिसे लोग आशु के नाम से जानते हैं ,नाम से कम उसके काम से लोग ज्यादा जानते है।एक नाम आशी जिसकी अदाओं से लोग जानते है  जो एक खूबसूरत type की लड़की है ।खूबसूरती की दुनिया मे जिसका बड़ा नाम है जिसके लिए लोग अपना हाथ पैर तक काट लेते हैं जिसके लिए खून से खत लिखे जाते हैं ,अब इससे आप अंदाजा लगा सकते है कि ओ कितना खूबसूरत है।मजे की बात ये है कि दोनों एक ही संस्थान में पढ़ते हैं और खुशी की बात तो ये है कि दोनों एक ही धर्म को मानते हैं जिसे हिन्दू कहा जाता है,जाति दोनों की अलग है पर ये कोई बड़ा मुद्दा नहीं है क्योंकि दोनों बालिक और समझदार भी हैं। संस्थान खुलता है लोगो का आना-जाना शुरू होता है,सब अपने लिखाई पढ़ाई में ब्यस्त हो जाते हैं।मुलाकात आशु और आशी की भी होती है क्लास में क्योंकि क्लास में लोग आमने सामने बैठते हैं।चूंकि क्लास में सब नये नये रहते है इसलिए एक दूसरे के बारे में जानने की उत्सुकता बनी रहती है।अच्छा......जब मामला नया-नया रहता है तो हम इतने आतुर रहते लोगों को जानने समझने में कुछ पूंछो ही मत,खैर क्लास में मिलने-जुलने का सिल-सिला सुरु हो जाता है Actually आशु थोड़ा नटखट ...

आखिर दूरियां इतनी क्यूं बरकरार हैं।

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आखिर दूरियां इतनी क्यूं बरकरार हैं दिन की ख़ुशी है या रातें बेबसी का शिकार हैं। आज ये 'दरिया' दिवाना स क्यूं लगता है नए गम का आगाज़ है या चढ़ा प्रेम का बुखार है। खोया खोया से क्यूं आज़ ये चाँद है लुका-छिपी बादलों से है या दूजा चाँद सर पे सवार है।

गज़ल आज़ पलकों से पर्दा हटाया हमने।

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गज़ल दुश्मनों को भी दोस्त बनाया हमने आज़ पलकों से पर्दा हटाया हमने। गिर गए हैं जिन नज़रों में आज़ कभी नज़रों पे उनको बिठाया हमने। वक्त के नशे में चूर आईने चिढ़ाते हैं खुद को दर्पण से दूर भगाया हमने। उन पर जां लुटाते रह गए हम जिन्हें खुद से बहुत दूर पाया हमने। दिल में किसी को जब भी बसाया ज़ख्मों के सिवा न कुछ पाया हमने। लोग कहते हैं तू क़िस्मत में नहीं मेरी हर मोड़ पर क्यूं तुझी को पाया हमने। उदास दिल से बज़्म को जब भी निहारा खाली दिल सा, सारा जहां पाया हमने। रूठी चांदनी से क्या शिकवा करें जब झूंठा चांद ही दिल में बसाया हमने।
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हंसी भी छीन ली ख़ुशी भी छीन ली सातिर थी जिंदगी इतनी चेहरे से लसी भी छीन ली।। तस्वीर भी छीन ली तक़दीर भी छीन ली ज़ालिम थी जिंदगी अपनी हाथों से लकीर भी छीन ली।। रामानुज 'दरिया'

मुक़म्मल जिंदगी है जितनी।।

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क्या रह गयी थी कुछ चालें ये गम मेरे साथ चलने की। जो कहर बन के बरसी हो तन की सांसें झटकने की। फ़िराक  में   रहती   है   तू मेरा हर ख्वाब चटकने की। बचा  ही  क्या   है  मेरे पास सिवा दिमाग के सटकने की। पूरी कर ले तू हर ज़िद अपनी मुक्कमल  जिंदगी है जितनी। क्या  पता  आ  जाये  सूरज कब  बादल   की  चपेट  में। और रोशनी भी चढ़ जाये अंधेरों    की    भेंट    में।

आख़िर बात क्या है पापा हमें कुछ बताते क्यूं नहीं हो। Happy Father's Day

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हरदम -हरदम कहते हो पर  आते कभी नहीं हो आख़िर बात क्या है पापा हमें कुछ बताते क्यूं नहीं हो। जब देखो तब रोती रहती हैं बैठ कर कहीं किसी कोने में इतना  क्यूं  रूठे  हो  पापा चुप मम्मी को कराते क्यूं नहीं हो। डांटती  भी   नहीं   है गलती पर मारती भी नहीं है अब  आप  चले आओ पापा मम्मी पास सुलाती भी नहीं हैं। बाबू का बैग फट गया है मेरी चप्पल भी टूट गयी है अब हम स्कूल जाते नहीं पापा इस हाल से उबारते क्यूं नहीं हो।

उसके लिखे जज़्बात को।।

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कितना सम्भाल कर रखा है उसके लिखे जज़्बात को काश की समझ पाती ओ खामोश लबों के हालात को। इक - इक शब्द उसके आज भी दिल पर राज़ करते हैं काश समझा पाता मैं ख़ुद को उससे की हर मुलाकात को। महसूस किया है दर्द के चुभन को पास आकर दूर जाता है कोई निकाल दिया कब का दिल से अपने निकाल पाता नहीं रगों से ख्यालात को। ओ college का बहाना ओ morning walk पर जाना सब कुछ तो भुला दिया मैंने करोगे क्या, मुझको पाकर तुम भुलाऊँ कैसे उसके सवालात को।
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गर इंशान अपनी किस्मत खुद लिखता कौन जिंदगी में इतनी मुसीबत लिखता।। बताओ, यदि खूबसूरती पर्दे में दिखती फिर ये हुस्न बेपर्दा क्यूं दिखता।। सर्प चंदन को विषैला नहीं कर सकता फिर इक बूंद नीबू से क्यूं दूध फटता।। कड़ी मेहनत ही सफलता की कुंजी है गधा क्यूं जंगल का राजा नहीं बनता।। हर रूप में पूज्नीय जब नारी है कूचे में क्यूं घात लगाये शिकारी है।। जब भ्र्ष्टाचार पसंद नहीं होता फिर क्यूं भ्र्ष्टाचार बंद नहीं होता।। जब मुस्कान चेहरे की रौनक बढ़ती है फिर क्यूं उदासी सूरत पर चढ़ आती है।। जब रोशनी जग का अंधेरा मिटाती है फिर हर बार क्यूं ये काली रात आती है।।                            रामानुज दरिया

चाहत थी कि रोंक लूँ उसे।।

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चाहत थी कि रोंक लूँ उसे पर तेवर ने झुकने न दिया। जाना तो चाहती न थी पर अहम ने रुकने न दिया। एक ही दौलत थी मुस्कुराने की बेबसी ने जिसे चुनने न दिया। झूठी तारीफें तो खूब सुनी सच को कानों ने सुनने न दिया। कसर न रही तुझे भुलाने में पर यादों ने मुझे उबरने न दिया। तलाश थी जिस मंजिल की मुझे उधर से किस्मत ने गुजरने न दिया। हौंसले जब भी फ़ौलादी बने अपनों ने मैदान में उतरने न दिया । बैठती तो थी आईने के सामने बिरह ने कभी संवरने न दिया।

अपनों की कद्र नहीं ग़ालिब तेरी पनाह में।।

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अपनों की कद्र नहीं ग़ालिब तेरी पनाह में सज़ा उसकी मिली,न थे शामिल जिस गुनाह में। ज़ख्म हरा था हरा ही रह गया मरहम दिल न मिला आकर तेरी दरगाह में। पैर फिसलता नहीं ख़ुदा तेरी उस दुनिया में सुकून मिलता है, बस आकर कब्रगाह में। मुक्कमल माफ़ी ही होती तेरी अदालत में गर रिस्वत का ख्याल ,न आता गवाह में। न काम की किच-किच न बॉस का चिर्र-पों बनकर राजा रहा करते थे चरागाह में। जब वक्त की तपिस हो , ज़रा ध्यान से सुनो 'दरिया' अपने फ़ैसले बदल दो उसकी निगाह में।।

जिंदगी।।

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मेरे साथ जिंदगी ने कई खेल खेले हैं कहीं समय तो कहीं बेबसी के दर्द झेले हैं नूर ही आंखों के नासूर हो गये हमने बदलते रिश्तों के दंश झेले हैं।। हम बेगुनाही का। सुबूत देते रहे और ओ गुनहगार सिद्ध करते रहे सबकी निगाहों में गिरा कर हमें अपनी कुशल वकालत का परिचय देते रहे।।