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जिंदगी का बोझ अब मुझसे ढोया नही जाता |

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जिंदगी का बोझ अब मुझसे ढोया नही जाता सूख चुके आंशु की अब रोया नही जाता | उतर गया भूत सर से मेरे अपनों का भी कि अपनों के लिए बीज बोया नही जाता |   जिंदगी का अरमान तो सिर्फ तोड़ती पत्थर है मार कर खुद को खुद से अब रोया नहीं जाता |   कीचड़ ही कीचड़ हो जहाँ कमल खिला करते थे जरुरत से ज्यादा खुद को डुबोया नही जाता |   मिट चुकी लकीरें हाथों से किस्मत की कोरोना कि बार - बार हाथों को मुझसे धोया नहीं जाता |   वादा था एक उम्र साथ निभाने का इतना जल्दी मुझसे किसी को खोया नहीं जाता |   गर लायक है जिंदगी जीने की तो जियो दरिया हर किसी के कंधे पे सर रख के रोया नहीं जाता |   गर तुम्हारी है तो तुम्हारी होकर ही रहेगी   हर दर को आंशुओं से भिगोया नहीं जाता |           “दरिया”

न कभी हम मिल पायेंगे।

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  न दाग दामन में लगने पायेंगे भले जान जिस्म से चले जायेंगे न कभी हम मिल पायेंगे। नयन बस नीर बहायेंगे नज़र नजर को तरस जायेंगे न कभी हम मिल पायेंगे। इरादे सारे बदल जायेंगे वादे सब भूल जायेंगे। न कभी हम मिल पायेंगे। नकाब चेहरे पर आयेंगे हम इतने फरेबी हो जायेंगे। न कभी हम मिल पायेंगे। वादे रात को करके आयेंगे सुबह घोल चाय में पी जायेंगे न कभी हम मिल पायेंगे। त्योहार सपनों में आयेंगे हम अपनों के लिए गिड़गिड़ाएंगे न कभी हम मिल पायेंगे।

ओ भी गुजर गयी पास से।

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 आस जगी थी इक खास से ओ भी गुजर गयी पास से। जो भी आया सांत्वना दे गया न रूबरू हुआ मेरे अहसास से। भले न चल सके दो कदम साथ पर मिली थी अंदाज़-ए-झकास से। अभी चंद बातें ही तो हुयी थी उससे चला गया मैं अपने होशोहवास से। कल चाँद भी शर्मा गया शाम को छत पर गयी थी ,अंदाज़-ए-खास से। उसके सिवा न अब कोई दिल मे आये धड़कनों में मिल जाये मेरी सांस से। तब भी खाली था और आज भी हो गये दिल-ए-अहसास बक़वास से।

मन मीत मिल जाये।

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 सावन झूम कर आये रातें भी गीत सुनायें मन मीत मिल जाये। कोयल भी कूक लगाये जीवन आनंदित हो जाये मन मीत मिल जाये। तकलीफें भी तरस जाये खुशियां जीत जायें मन मीत मिल जाये। पुष्प राहें सजायें चाँद गले लग जाये मन मीत मिल जाये। बदन भी दमक जाये चमक आंखों में आये मन मीत मिल जाये। पर ख्वाबों में लग जाये बल होंसले को मिल जाये मन मीत मिल जाये। मंज़िल भी राह निहारे राहें मंज़िल हो जायें मन मीत मिल जाये। बिंदिया चूड़ी कंगन मिल कर सेज़ सजायें मन मीत मिल जाये।

बस भाव बदल गये हैं।

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 ओ बातें अब नहीं होती न प्लीज़ प्लीज़ न सॉरी न ऑनलाइन होने की चिंता न गुड नाईट की बारी न लफड़े न झगड़े न दोस्ती न यारी। रह गयी तो बस उदास जिंदगी और समझदारी न मॉर्निंग वॉक पे आना न घंटों बतियाना न चिढ़ना न चिढ़ाना बस पैसे की बात और तनख्वाह सारी। रिस्ते भी वही हैं बस भाव बदल गये हैं पहले बातों बातों जितना भाव खाते थे उतना तो सुबह उठ कर अब कुल्ला करते हैं बचपन छूट गया पड़ गयी जवानी भारी। "दरिया"

तुम भी तो अब चले जाओगे।

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 इतना एटीट्यूड दिखाकर तुम लगने किसके गले जाओगे तुम भी तो अब चले जाओगे। रे - टे टर-टर जैसी हरकतों से कबतक फुसला कर बहलाओगे। तुम भी तो अब चले जाओगे। इस भ्रम में मत रहना दरिया की हुकूमत तुम्हारी ही चलेगी पुरानी सारी बखरियां तोड़कर अब तो मकान नये बनाओगे तुम भी तो अब चले जाओगे। "दरिया"

लगता है की इश्क मेरा अब।

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  करना चाहूं कितना भी गलत ज़मीर खबरदार ही कर देगा। लगता है की इश्क मेरा अब मुझे बरबाद ही कर देगा। करने से नहीं ग़ालिब यहां कहने से ही बदनाम होगा गलियां इश्क की है "दरिया" आगाज से ही अंजाम होगा। रिश्ते की सीमायें तो सिर्फ हमे ही पता है साहब दूर से देखने वाला यहां जाने क्या क्या इल्जाम देगा। "दरिया"

कुछ बदमाशियां तो जोबन भी करता है।

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  जरूरी नहीं कि गलतियां आंखों की हो मीठी सरारतें अब दिल भी करता है। हर बार बुरा ओ दुपटटा ही नहीं होता कुछ बदमाशियां तो जोबन भी करता है। पनाह देना किसी को,दिल में बुरी बात नहीं ज्यादातर इशारे तो अब बदन ही करता है। यौवन की आवाज़ तो अलग सी होती है ज्यादा नख़रे तो अब पैर ही करता है।

न दर्द किसी को बता देना।

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  खुदी से खुद को समझा लेना न दर्द किसी को बता देना। बेशर्म हो जायें आंखें रोते-रोते वज़ूद खुद का खुद से मिटा देना। सुधारो की जब तक सुधार सकते हो बेकाबू हालात से हाथ छुड़ा देना। समझदारी है कि अब स्वार्थी हो जाओ निःस्वार्थ जिंदगी से खुद को हटा देना।

क्यूँ ख़्वाब को ख्वाब रहने दिया जाये।

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एक हौंसला और 'पर' को दिया जाये क्यूँ ख़्वाब को ख्वाब रहने दिया जाये।   रूख हवा का भी मोड़ सकती हो तुम यूं जुल्फों को जो खुला रहने दिया जाये। ठान लो, की ऊंचाइयां कमतर दिखेंगी क्यू न सीढियां एक एक कर चढ़ा जाये। तमाम उम्र निकल ही जाती है सोंचने में क्यू न इसे कल पर छोड़ दिया जाये। यकीं मानो चाँद राहें निहारेगा आपकी क्यूं न तारों को आज समेट लिया जाये। थक गये हो गर अपनों के लिये जीते-जीते क्यूं न एक बार अपने लिये जिया जाये। गर तसल्ली नहीं मिलती अपने कर्मों से क्यूं न इक बार राहें बदल लिया जाये। "दरिया"

रह पाये कौन।

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  मुश्किलों का बाजार इतना गरम हो वहसी दुनिया में खुश रह पाये कौन। सिस्टम ही भ्रष्टाचार की देन हो ईमानदार बनकर रह पाये कौन लगी हो लत नशे की गर "दरिया" जली सिगरेट फिर बुझाये कौन। परिणाम गर भयावह हो इश्क का फिर नयना से नयन लड़ाये कौन। हर लें हर बाधाओं को हरि भी पर इतना जल उन्हें चढ़ाये कौन। स्वार्थी होने का अपना अलग मजा है तुझे निःस्वार्थ अब दूध पिलाये कौन। खामोशी भी कांप जाती है मेरी सन्नाटे से यहां उबर पाये कौन। दिल लगाना भी तो गुनाह है जनाब यही बात तुझे बार - बार बताये कौन। तेरा आना और जाना दोंनो समान हो फिर साथ रह कर स्वांग रचाये कौन। मालूम हो तेरी चंचलता भरी हैवानियत स्वर्ग सी जिंदगी जहन्नुम बनाये कौन। जी चाहता है कि सिरहने सर रख दूं वक्त को इतना जाया कर पाये कौन। जरूरत नहीं तुझे मेरी तो कोई बात नि हर बार अपना होने का अहसास कराये कौन।

चली गयी।

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तू आकर ऐसे चली गयी जिंदगी फिर से छली गयी तड़पते जिस्म से जैसे आज आत्मा चली गयी सौदा इश्क का किया उसने बाजार-ए-हुस्न में चली गयी वजूद खुद का मिटाकर दरिया नाल-ए- नदी गयी।

अहसास।

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दूर रह कर भी पास हो गए थे जाने कैसे इतना खास हो गए थे। रह गये कुछ लम्हे यादों के लिए जी कर जिन्हें हम साथ हो गए थे। वक्त है ,कि फासले ही फासले है वक्त था,साथ में दो-दो हाथ हो गए थे।

जिसको जाना था ओ चले गये।

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साथ लेकर सारे शिकवे गिले गये जिसको जाना था ओ चले गये। बात पुरानी हवेली की करते हो साहब नीव नई बखरियो के अब तो हिल गये। शिकायत अपनों से ही रहती है सदा कौंन गैरों के लिपटने गले गये। चमन खाली नहीं होता 'दरिया' यहाँ कितनों के माली बदले गये। मज़ाल क्या बहार की जो न आये हर कली जो चमन के खिल गये।

इश्क कर लें हम दोंनो।

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अमावस्या की मिलन फिक्स कर लें हम दोनों चलो इक बार फिर से इश्क कर लें हम दोनों। अय्याशियों का शिल- शिला जारी रहे बस चलो एक साथ दो जिस्म कर लें हम दोंनों। मिलन की आरज़ू है बस संगमरमरी बदन की रेशमिया वाला फिर से किस कर लें हम दोनों। कटती तो है पर सदाबहार जैसी नहीं है जवानी को भी इसमें मिक्स कर लें हम दोनों। गुलाबी ओंठ, हंसी जिस्म और सुरमयी आंख आओ रात में ही आज सिक्स कर लें हम दोंनो।

तुम जीत गयी मुझसे।

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तुम जीत गयी मुझसे मन हर गया खुद से था तो बहुत कुछ कहना आवाज़ निकली न मुह से। तेरे लिए मन तड़पा आंखें रोयी बहुत दिल से रोशन तो बहुत सारा किया अंधेरा मिटा न अपने तल से बिखर गया आंगन अपना जब तू बढ़ गयी हद से प्रेम तो बस इबादत है खुद का फर्क नी, कितनी छोटी है कद से कोशिश करना तो कोई गुनाह नहीं जरूरी नहीं, मिट जाये बुराई जग से। हर कोई झुक जाये मेरे सामने छुई ऊंचाई इतनी नहीं कद से इक तरफ़ा न होती गर मोहब्बत यकीं मानो लिपट जाती तन से। हर साँस में आश छुपी है उसकी वर्ना निकल जाती मेरे बदन से। मैं उम्र भर राहें सजाता रहूंगा ओ तरसएगी मुझे हज़ारों जतन से। मैं बंज़र हो गया खुदा तेरे दिन के इस तपन से। देख आज सावन भी जा रहा है बिना उसकी एक मिलन से ओ बदसूरत न थी इतना जितना हो गयी औरों की जलन से। ये ज़र्रा ज़र्रा एक दिन कराहेगा उसकी बिछुड़न जैसी मिलन से।

कोई सपना न रहा/

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टूट कर बिखरा हूँ कि कोई सपना न रहा हो चुके सब पराये कोई अपना न रहा। छोड़ कर गांव शहर क्या आ गये किराये के जीवन में घर का अंगना न रहा। पर कटे परिंदे के उसे उड़ना न रहा नसीब बदली ऐसी कि  हाथ का कंगना न रहा। करें क्या सिंदूर का जब सजना ही न रहा धुल गये श्रृंगार कि सजना न रहा। हया कराहने लगी बदन का नपना न रहा ओढ़ ली मजबूरी की चादर कोई रंक या रजना न रहा।         "दरिया"

यादों के संग संग

दूर रह कर भी पास हो गए थे जाने कैसे इतना खास हो गए थे। रह गये कुछ लम्हे यादों के लिए जी कर जिन्हें हम साथ हो गए थे। वक्त है ,कि फासले ही फासले है वक्त था,साथ में दो हाथ हो गए थे।

मेरे पास चली आना।

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सावन जब घिर - घिर आये और कोयल भी गीत सुनाये मेरे पास चली आना। तारे जब दीपक बन जायें और आँखे भी मोती बरसायें मेरे पास चली आना। केशव जब जब लहरायें अंगड़ाई बेकाबू हो जाये मेरे पास चली आना। पायल में झंकार आ जाये और होंट गुलाबी हो जायें मेरे पास चली आना। चेहरे पर रौनक आ जाये आंखे मधुशाला हो जायें मेरे पास चली आना। रातें जब उधार हो जायें दिन भी लाचार हो जाये मेरे पास चली आना। बिस्तर लड़ - लड़ जाये तकिया भी नींद चुराये मेरे पास चली आना। भले साल पचपन हो जाये याद बचपन की आ जाये मेरे पास चली आना।

जिंदगी ऐसी दुशवार हो गयी।

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जिंदगी ऐसी दुशवार हो गयी जैसे सावन में कुवार हो गयी। पार होती भी तो कैसे भंवर से नैय्या अपनी तो पतवार हो गयी। इज़्ज़त इतनी दे दी उसे योग्यता अपनी ही गवांर हो गयी। छड़ी के बदले भुजा दी जिसे उसके आगे शरीर बेकार हो गयी। आंखों से ओझल जिसे होने न दिया उसी के आगे लाचार हो गयी। "दरिया"