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जिंदगी झंड थी झंड ही रह गयी।
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जितनी भी ख्वाइशें थी दरिया वक्त की संदूक में बंद रह गयी जिंदगी झंड थी झंड ही रह गयी। न थी पहले न कोई बाद आयी उदासी जो दिल में उतर आयी। मैनें चाहा भी तो क्या उसे उम्रभर ओ अनजान ही रह गयी जिंदगी झंड थी झंड ही रह गयी। मान लूंगा खुदा शक्ती तुम्हारी बन जाये जो इक बार हमारी वर्ना फर्क क्या कब्र और तुझमें अगरबत्तियां पहले भी जलती थी और अब भी जलती ही रह गयी जिंदगी झंड थी झंड ही रह गयी।
हिंसाब होकर रहेगा।
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उठी है कलम तो, हिंसाब होकर रहेगा। मिलेगी सुरक्षा वर्दी को साथ वकीलों के , न्याय होकर रहेगा। चीखता रहे जनमानस भले ही ऑक्सीजन खातिर प्रदूषण प्रकृति के साथ अब पूर्णतयः होकर रहेगा। लाल किले से दहाड़ने वाला शेर भले ही मौन हो जाये, बदली बन प्रदुषण धरा पे छा जाए अंगारें उठती रहें, भले ही वकीलों के हाहाकार से भले दिल्ली वाला मफ़लर गले मे ठिठुर कर रह जाये लेकिन उठी है कलम तो, हिसाब होकर रहेगा। 'दरिया'
याद तुम्हारी आती है।
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रिम झिम बारिस के फुहारों से आते जाते इन त्योहारों से याद तुम्हारी आती है। नुक्कड़ के नक्कारों से बजते ढोलक और नगारों से याद. तुम्हारी आती है। ओलों की मारों से सर्दी की लाचारों से याद तुम्हारी आती है। जीवन की हारों से व्यथित मन मारों से याद तुम्हारी आती है। ओठों की धारों से जिस्म की अंगारो से याद तुम्हारी आती है। समर्थन और विरोधों से विकास की अवरोधों से याद तुम्हारी आती है।
स्त्री जीवन।
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Image google se करवाया था फोन किसी से उसने,और यहां गुमसुदगी की रिपोर्ट लिखी जा रही थी । ठीक से रो भी नही पा रही थी हुये सितम की दास्तां सुना रही थी। दो दिन तक होश नहीं आया था जाने कैसे -कैसे उसको सताया था दर्द संभालने की कोशिश कर रही थी रो-रो के अपनी माँ से कह रही थी। सास हाथ से ससुर लात से मारते हैं मां पति देव तो हर बात पर मारते हैं। तीन बेटी हुयी पर बेटा नहीं हुआ मां इसी वजह से घरवाले धिक्कारते हैं। कलमुंही, कर्मजली जाने कैसे-2 बुलाते हैं कभी सिगरेट तो कभी चमटे से जलाते हैं। लाठी डंडे भी उनको हल्के लगते हैं मां जब मुँह पे बूट रख के मारने लगते हैं। हाथ जोडूं कितना भी मैं गिड़गिडाऊं मां कर निर्वस्त्र, ज़ख्म पर नमक रगड़ते हैं। छोड़कर स्वार्थी दुनिया जा रही हूँ मां आज मैं अपना वजूद मिटा रही हूँ। क्या -क्या जतन नहीं किया मारने का खाने में तो कभी पीने में जहर दिया मां पता नहीं कैसे हर बार बचती रही मां सांसों की डोर न इतनी सस्ती रही मां। पर अब मैं और नहीं लड़ पाऊँगी लकीरों को न हाथों स...
बस यही हर बार पूंछती थी।
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बस यही हर बार पूंछती थी जो लिखते हो कहानी किसकी है। करते मुहब्बत मुझसे हो फिर अंगूठी निशानी किसकी है। दवा भी तुम दुआ भी तुम फिर छटपटाती जवानी किसकी है। याद नहीं करते हो फिर फ़िज़ा में रवानी किसकी है। अब मीडिया भी अपने हाथ में है हस्ती बनानी, मिटानी किसकी है। बजबजाती नालियों से जान लो गाँव में प्रधानी किसकी है।
मेरे पास चली आना।
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तुम धन से न सही और तन से न सही मन से चली आना कभी दिल धड़के तो मेरे पास चली आना। एक दिन न सही, एक रात न सही बस दो पल के लिए मेरे पास चली आना। अंदर चलता द्वंद मिले दरवाज़ा भी बंद मिले खिड़की के ही सहारे मेरे पास चली आना। ऊब जाना रिश्तों से तुम छोड़ घरबार चली आना इंतजार रहेगा ता उम्र बस इक बार चली आना। सुखों की जरूरत हो बेशक तुम मत आना खुशियों की जरूरत हो मेरे पास चली आना। अरसे बीत गए तुझसे...
जी चाहता है, जी भर के देखूं उसे।
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बेशुध हवा को बवंडर बना देना हो सके , 'दरिया' समंदर बना देना। भ्रस्ट रोग ने खोखला कर दिया हो सके, फौलादी अंदर से बना देना। जी चाहता है, जी भर के देखूं उसे हो सके, मूरत मेरे अंदर बना देना। मेरी रूह का खज़ाना बस वही है हो सके, सौ ताले के अंदर छुपा देना। लग जाये न कहीं उसको नजर भी मेरी हो सके, माथे पे टीका सुंदर लगा देना। जब वक्त तेरा हो, ध्यान से सुनो दरिया हो सके,किनारों को भी अंदर समा लेना। चाह कर भी नहीं रोंक पाता हूँ खुद को हो सके,मोहब्बत-ए-तरफ़ा का अंतर बता देना। जख़्मी दिल, किसी का नही होता 'दरिया' हो सके, सहारा देकर अंदर बुला लेना।
हम उस देश के वासी हैं।
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जहां पेशाब करना मना है वहीं करते मूत्र निकासी हैं हम उस देश के वासी हैं। गरीबी से तड़पता बचपन जहां चुपड़ के मिलती रोटी बासी है हम उस देश के वासी हैं। खिलाफ़ भ्र्ष्टाचार के आंदोलन होता लिप्त अधिकारी और चपरासी हैं हम उस देश के वासी हैं। कट्टा दौलत पर राजनीति टिकी शामिल भै या बबुआ चाची हैं हम उस देश के वासी हैं। नशेड़ी 'कबीर खान' तांडव करती सुपर 30 जैसी फ्लॉप हो जाती है हम उस देश...
पहली मोहब्बत।
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पहली मोहब्बत नयनों का पहली बार मिलना फिर मिलकर बिछड़ना हथेलियों का बालों में मचलना जुल्फों का खुद से बिखरना। आसान नहीं होता। साथ मे धीरे - धीरे चलना फिर चुपके से छुप जाना अचानक से सामने आकर फिर गले से लिपट जाना। आसान नहीं होता। जाते - जाते बाय कर जाना Byke कैम्पस में भूूूल जाना रात भर बाय को गुनगुनाना सुबह इंतजार में लग जाना। आसान नहीं होता। पंखुड़ियों को पकड़ कर हिलाना छत की बालकनी मे...
शबनमी ओंठ अंगारे बरसाने लगे।
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छुप - छुप कर बतियाता ही रहता हूँ मैं लगता है बगावत पे उतर आया हूँ मैं। मेरे कर्मो का आईना देखो 'दरिया' अपने ही विनाश पर उतर आया हूँ मैं। नजदीकियां बढ़ी थी विषम परिस्थिति में हालात बदलते , औकात में उतर आया हूँ मैं। सम्भाल कैसे पाओगे ए - ख़ुदा हमें जब गिरने पे ही उतर आया हूँ मैं। हो सकता है कचहरी लग जाये कल खिलाफ़ लिखने पे जो उतर आया हूँ मैं। अब तो तरक्की ही पक्की है साहब जब चाटुकारिता...
हिंदी से हिन्दू- हिंदुस्तान है।
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सुबह भी तुझसे होती तुझ संग गुजरती शाम है हे मेरी मातृ जननी तुझे शत - शत प्रणाम है। सांसों में है तू बसी तुझ संग ही जुबान है यूं ही तू फूले - फले तुझ में ही हिंदुस्तान है। तेरी उपस्थिति से ही मेरी लेखनी का सम्मान है मिसाल दूं क्या मैं जब तू ही विधा की चटटान है। लिख गये भारतेन्दु जी शुक्ल जी का भी मान है नारा इतिहास का यही हिंदी से हिन्दू-हिंदुस्तान है।
एक घटना जिसने देश को झकझोर का रख दिया था।
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ओडिशा के एक अस्पताल की ह्रदयविदारक घटना जिसमें दीनू मांझी नामक आदिवासी की पत्नीक tv के कारण मृत्यू हो जाती है और वह अपनी पत्नी को कंधों पर उठाकर चल देता है और 12 km तक जाता है,इसके बाद ही उसको एम्बुलेंस मुहैया करायी जाती है जो हमारे देश की अव्यवस्था का आईना पेश करती है।जिस घटना ने पूरे देश को झकझोर के रख दिया। ओ लाश नहीं आखिरी आस थी लाचार व्यवस्था की जिंदा अहसास थी मजबूत कंधे की ओ कहानी है कांपते मेरे रूह की जवानी है हर सख्स के लवों की आवाज़ है सरेआम मरती इंसानियत आज है बहुतों ने देखा बहुतों ने सोंचा होगा हर किसी ने व्यवस्था को कोसा होगा तस्वीर देख कर होंगे हम जिंदा नहीं इस पर इंसानियत होती शर्मिंदा नहीं फुट -फुट कर रोया किया कितना गिला होगा जनाजा लेकर जब प्रियतम का चला होगा। कितनी भयावह दुःखद रही ओ घड़ी होगी जब शौहर के कंधे पर चली पगडंडी होगी। यह तस्वीर क्या बताने के लिए काफी नहीं कि हम ज़मीर बेंचने में करते न इंसाफी नहीं आ...