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गज़ल आज़ पलकों से पर्दा हटाया हमने।
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गज़ल दुश्मनों को भी दोस्त बनाया हमने आज़ पलकों से पर्दा हटाया हमने। गिर गए हैं जिन नज़रों में आज़ कभी नज़रों पे उनको बिठाया हमने। वक्त के नशे में चूर आईने चिढ़ाते हैं खुद को दर्पण से दूर भगाया हमने। उन पर जां लुटाते रह गए हम जिन्हें खुद से बहुत दूर पाया हमने। दिल में किसी को जब भी बसाया ज़ख्मों के सिवा न कुछ पाया हमने। लोग कहते हैं तू क़िस्मत में नहीं मेरी हर मोड़ पर क्यूं तुझी को पाया हमने। उदास दिल से बज़्म को जब भी निहारा खाली दिल सा, सारा जहां पाया हमने। रूठी चांदनी से क्या शिकवा करें जब झूंठा चांद ही दिल में बसाया हमने।
मुक़म्मल जिंदगी है जितनी।।
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क्या रह गयी थी कुछ चालें ये गम मेरे साथ चलने की। जो कहर बन के बरसी हो तन की सांसें झटकने की। फ़िराक में रहती है तू मेरा हर ख्वाब चटकने की। बचा ही क्या है मेरे पास सिवा दिमाग के सटकने की। पूरी कर ले तू हर ज़िद अपनी मुक्कमल जिंदगी है जितनी। क्या पता आ जाये सूरज कब बादल की चपेट में। और रोशनी भी चढ़ जाये अंधेरों की भेंट में।
आख़िर बात क्या है पापा हमें कुछ बताते क्यूं नहीं हो। Happy Father's Day
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हरदम -हरदम कहते हो पर आते कभी नहीं हो आख़िर बात क्या है पापा हमें कुछ बताते क्यूं नहीं हो। जब देखो तब रोती रहती हैं बैठ कर कहीं किसी कोने में इतना क्यूं रूठे हो पापा चुप मम्मी को कराते क्यूं नहीं हो। डांटती भी नहीं है गलती पर मारती भी नहीं है अब आप चले आओ पापा मम्मी पास सुलाती भी नहीं हैं। बाबू का बैग फट गया है मेरी चप्पल भी टूट गयी है अब हम स्कूल जाते नहीं पापा इस हाल से उबारते क्यूं नहीं हो।
उसके लिखे जज़्बात को।।
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कितना सम्भाल कर रखा है उसके लिखे जज़्बात को काश की समझ पाती ओ खामोश लबों के हालात को। इक - इक शब्द उसके आज भी दिल पर राज़ करते हैं काश समझा पाता मैं ख़ुद को उससे की हर मुलाकात को। महसूस किया है दर्द के चुभन को पास आकर दूर जाता है कोई निकाल दिया कब का दिल से अपने निकाल पाता नहीं रगों से ख्यालात को। ओ college का बहाना ओ morning walk पर जाना सब कुछ तो भुला दिया मैंने करोगे क्या, मुझको पाकर तुम भुलाऊँ कैसे उसके सवालात को।
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गर इंशान अपनी किस्मत खुद लिखता कौन जिंदगी में इतनी मुसीबत लिखता।। बताओ, यदि खूबसूरती पर्दे में दिखती फिर ये हुस्न बेपर्दा क्यूं दिखता।। सर्प चंदन को विषैला नहीं कर सकता फिर इक बूंद नीबू से क्यूं दूध फटता।। कड़ी मेहनत ही सफलता की कुंजी है गधा क्यूं जंगल का राजा नहीं बनता।। हर रूप में पूज्नीय जब नारी है कूचे में क्यूं घात लगाये शिकारी है।। जब भ्र्ष्टाचार पसंद नहीं होता फिर क्यूं भ्र्ष्टाचार बंद नहीं होता।। जब मुस्कान चेहरे की रौनक बढ़ती है फिर क्यूं उदासी सूरत पर चढ़ आती है।। जब रोशनी जग का अंधेरा मिटाती है फिर हर बार क्यूं ये काली रात आती है।। रामानुज दरिया
चाहत थी कि रोंक लूँ उसे।।
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चाहत थी कि रोंक लूँ उसे पर तेवर ने झुकने न दिया। जाना तो चाहती न थी पर अहम ने रुकने न दिया। एक ही दौलत थी मुस्कुराने की बेबसी ने जिसे चुनने न दिया। झूठी तारीफें तो खूब सुनी सच को कानों ने सुनने न दिया। कसर न रही तुझे भुलाने में पर यादों ने मुझे उबरने न दिया। तलाश थी जिस मंजिल की मुझे उधर से किस्मत ने गुजरने न दिया। हौंसले जब भी फ़ौलादी बने अपनों ने मैदान में उतरने न दिया । बैठती तो थी आईने के सामने बिरह ने कभी संवरने न दिया।
अपनों की कद्र नहीं ग़ालिब तेरी पनाह में।।
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अपनों की कद्र नहीं ग़ालिब तेरी पनाह में सज़ा उसकी मिली,न थे शामिल जिस गुनाह में। ज़ख्म हरा था हरा ही रह गया मरहम दिल न मिला आकर तेरी दरगाह में। पैर फिसलता नहीं ख़ुदा तेरी उस दुनिया में सुकून मिलता है, बस आकर कब्रगाह में। मुक्कमल माफ़ी ही होती तेरी अदालत में गर रिस्वत का ख्याल ,न आता गवाह में। न काम की किच-किच न बॉस का चिर्र-पों बनकर राजा रहा करते थे चरागाह में। जब वक्त की तपिस हो , ज़रा ध्यान से सुनो 'दरिया' अपने फ़ैसले बदल दो उसकी निगाह में।।
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आज पूँछ ही लिया उसने कौन हो तुम पकड़ कर उंगलियां चला था जिसकी । छोड़ दी जिसके लिए रोजी- रोटी अपनी ओ कहते हैं आज सुनूं मैं किस- किसकी। चूर थे जिसको उठाने में हम कभी किया चूर उसी ने अरमानों की कश्ती। रिस्क जिंदगी की लेकर साथ जिसके चले थे वही साथ बैठना मेरे आज समझते हैं रिस्की। 'दरिया' कहे भी क्या दुनिया के दस्तूर की चढ़ा पेंड़ पर जड़े काट लेते हैं जिसकी।
Happy Mother's day.माँ मैं तुझे कैसे भूल जाऊं।।
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कभी - कभी मैं सोंचता हूँ उस पंखे से झूल जांऊ जिंदगी हमेशा रुलाती है इसे गहरी नींद में सुला जाऊं।। पर माँ तेरी याद आ जाती है पल भर में मेरी सोंच बदल जाती है मैं सारे गम खुशी से पी जाऊं पर माँ मैं तुझे कैसे भूल जाऊं।। कभी - कभी मैं सोंचता हूँ एक प्याला जहर का लगाऊं नफ़रत - ए - जमाना हो गया अब मैं मौन हो जाऊं।। याद आ जाता है माँ का ओ तराना टूट जाना पर किसी का दिल न दुखाना तेरी मीठी यादों संग गोदी में सो जाऊं माँ मैं तुझे कैसे भूल जाऊं ।। कभी - कभी मैं सोंचता हूँ रेलवे ट्रैक का शिकार हो जाऊं जिंदगी को ऐसी रफ्तार दूँ खुद को न कभी रोंक पाऊं।। उंगली के सहारे चलना सिखाया गम में भी हंसना सिखाया आंचल में खुशियों के फूल बरसाऊं माँ मैं तुझे कैसे भूल जाऊं।। दिल को मन से जोड़ जाऊं खुद को फौलादी कर जाऊं आत्महत्या सोंचना भी अपराध है यह संदेशा मैं घर -घर भिजवाऊं माँ मैं तुझे कैसे भूल जाऊं।। रामानुज 'दरिया'
चाह कर भी न हम मिल पायेंगे।।
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आज से खत्म ये लड़ाई हुई है दोस्तों से शुरू ये जुदाई हुई है। कौन याद रखता है अतीत की कहानी उगते सूरज की करते हैं सब तो सलामी। कल तक जो हम सब बिछड़ जायेंगे बसी आंखों में नमी न छुपा पायेंगे। टूटकर इस कदर हम बिखर जायेंगे चाह कर भी न हम मिल पायेंगे। यादों का दिल में ऐसा कारवां चलेगा मिलन कि आरज़ू लेकर ये दिन भी बढ़ेगा। ढल जायेगा दिन रात की आग़ोश में सिमट जायेगी जिंदगी मिलन की जोश में। मंजिलें तरक्की तो मिल ही जायेंगी अरमानों के पंछी तो उड़ ही जायेंगे। मिल न पायेंगी ओ बातें पुरानी नये वर्ष की ओ पंखुड़ी निशानी। बोतल घुमाके दिल - ए - राज़ सुनाना क्लास में ओ चिड़िया -सुग्गा उड़ाना। कालेजामों में ओ मिठास न होगी दोस्ती तो होगी पर बेमिशाल न होगी। मेरे दोस्तों इतना ख्याल रखना मुस्कुरा के अपना दिल-ए-हाल कहना । दूर ये सारे गम हो जायेंगे ख्यालों में ही गर मिल जायेंगे। रामानुज 'दरिया'
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काश सीखी हमने भी चमचागीरी होती न मुश्किलों की रात अँधेरी होती। यूं जाकर ना मैं लौट आता गर होता हमारा भी कोई गहरा नाता पानी की मांग पर चाय परोस देता ना दिलों को उनके जरा खरोच देता हर शब्द को उनके पलकों पे सजा लेता खा कर गाली डांट जी भर के मजा लेता काश इन कामों में दिखाई मैंने भी दिलेरी होती न मुश्किलों की रात अँधेरी होती। " दरिया"
लड़की नहीं, लड़कों की शान हो तुम।।
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खुशियों की खुशबू दर्द का चुभन गम सी जिंदगी,प्यारा अहसास हो तुम लड़की नहीं, लड़कों की शान हो तुम।। दर्द सह के प्रसन्न रहती भूखे रहके सबका पेट भरती दानी नहीं ,दानवीर का सम्मान हो तुम लड़की नहीं लड़को की शान हो तुम।। पूजा की थाली चाय की प्याली संस्कार की जाली विस्तर की गाली मोम सी मुलायम पत्थर की चट्टान हो तुम।। लड़की नहीं लड़को की शान हो तुम।। बचपन सुहाया चलना सिखाया अधरों का संगम कर बोलना बताया माँ नहीं ममता की अवतार हो तुम लड़की नहीं लड़को की शान हो तुम।। कंपकंपी सी ठंढ गर्मी का पसीना उदास पतझड़ बसन्ती महीना बदली नहीं बिन मौसम बरसात हो तुम लड़की नहीं लड़को की शान हो तुम।।