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समय से पहले जवान हुयी मैं।
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समय से पहले जवान हुयी मैं अपनी गलियों में बदनाम हुयी मैं। न चल सका पता घर वालों को अपने मुहल्लों में सयान हयी मैं। छुप कर ही चली हर नजर से मैं पर नजरों से ही परेशान हुयी मैं। लेकर तालीम सदा ही चली में फिर भी अंधेरों में हैरान हुयी मैं। पकड़ कर हाथ उस पार चली मैं रह गयी बस कटी हुयी मयान मैं। दर्द छलका जब तेरे आगे दरिया समाज में राजनीतिक बयान हुयी मैं।
बता तेरी कौन हूँ मैं।
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रगों में बहने वाले, लवों से पूछते हैं बता तेरी कौन हूँ मैं सुनकर तेरे सवालों को होता जा रहा अब तो मौन हूँ मैं। ओ वक्त भी क्या वक्त था जब मैं उसका था अब तो रह गया पौन हूँ मैं। रंग भरकर जिंदगी बे रंग करने वाले देख अब भी जॉन हूँ मैं। लेकर भूल जाने का हुनर तुझमें है बेवक्त सताऊंगा, बैंक का लोन हूँ मैं। कितनी मिन्नतें की थी तुझे पाने के खातिर आज भी किया हौंन हूँ मैं।
मालूम न था इस कदर हो जाऊंगा मैं।
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मालूम न था इस कदर हो जाऊंगा मैं अपनों के लिये ही ज़हर हो जाऊंगा मैं ओढ़ लूंगा मैं अय्याशियों के लिबास फिर फ़ैशन का शहर हो जाऊंगा मैं। दिन ब दिन दूषित होता जा रहा हूं लगता है नाला - नहर हो जाऊंगा मैं। उमस भर गयी रिश्तों में इतनी कि लगता है जून के दोपहर हो जाऊंगा मैं। मेरे किरदार में ओ चमक न रही कि बनकर तिरंगा फहर जाऊंगा मैं। आवाज़ कितनी भी आये मन्दिर-ओ-मस्जिद से लगता है कि अब बहर हो जाऊंगा मैं।
तो कोई बात हो।
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में पुकारूं आपको ओर आप मिलने चले आओ तो कोई बात हो। अधूरे ख्वाब में भी गर आप मुक्कमल हो जाओ तो कोई बात हो। सूखी दरिया में दो बूंद प्यार के डाल जाओ तो कोई बात हो। बेचैन बाहों को भी कभी पनाह दिलाओ तो कोई बात हो। सिसकती आंखों को भी कभी इक झलक दिखाओ तो कोई बात हो। जिस्म को चाह कर भी तुम रूह में उतर जाओ तो कोई बात हो। जवानी का बूढ़ा खत हूँ मैं तुम पढ़ के मुस्कुराओ तो कोई बात हो। भागता फिरता हूँ तेरे पीछे कभी तुम भी मुड़ जाओ तो कोई बात हो।
कोशिश-ए-अहसास।
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ये हवा तू उसके पास जाना जुल्फों को उसके ज़रा सहलाना आंखों में इक फूंक लगाकर मेरे होने का अहसास कराना। ये खुशबू तू भी उसके पास जाना सांसों में उसके ज़रा घुल जाना कैद कर लाना साथ अपने उसकी महक का अहसास कराना। ये काज़ल उसके पास जाना बनकर सुरमा आंखों में लग जाना ज़रा सा साथ अपने ले आना मेरी आँखों में उसकी छवि दे जाना रामानुज "दरिया"
जिंदगी - ए- राह में क्या - क्या नहीं देखा।
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जिंदगी - ए- राह में क्या - क्या नहीं देखा रोती खुशियां और विलखते गम देखा। यूं तो बहारों का मौसम खूब रहा मगर अपने हिस्से में इसका असर कम देखा। छोड़ रही थी स्याह, साथ कलम की तभी किस्मत को वहां से गुजरते देखा। हवा की तरह उनको गुजरते देखा फिर उम्मीदों को अपने बिखरते देखा। लत लगी थी साहब तो लगी ही रह गयी हमने खामोशियों को दिल में उतरते देखा।
गर देखना ही है तो अपने आप को देखिये।
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दुखती हथेलियों से जिंदगी के ताप देखिये गर देखना ही है तो अपने आप को देखिये। कोई आयेगा नहीं हिस्से का अंधेरा मिटाने उठाइये चरागों को और उसका ताप देखिये। ज़रूरत नहीं किसी के पैरों में गिड़गिड़ाने की उठाइये कदम और मंज़िल तक की नाप देखिये। ये दुनिया तुम्हें हंसीन सपनों जैसी दिखायी देगी बस एक बार बदलकर खुद अपने आप देखिये। इस दौर में गली गली नुमाइशें करती फिरती है यकीं नहीं होता, आप द्रोपदी का श्राप देखिये। असुरों के संगत में बनकर देवता रह सकते हो बस दृढ़ संकल्प के साथ ध्रुव का जाप देखिये। गधे और घोड़े में फ़र्क दिख जायेगा तुम्हें...
फ़ना उसी दिन मुझे मेरे खुदा कर देना।
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उसके ख्वाबों से एक दिन जुदा कर देना फ़ना उसी दिन मुझे मेरे खुदा कर देना। ख़्याल रहे कि उसकी परछाईं भी न पड़े दरिया खुद को इतना जुदा कर देना। झोपड़ी महलों से भी सुंदर लगने लगे मोहब्बत कुछ ऐसी ही अता कर देना। तुम्हें चाहे न चाहे दरिया उसकी मरज़ी मग़र दिल अपना उसी पर फ़िदा कर देना। महसूस हो कि प्रेमिका भी साथ नहीं देगी फिर ख़ुद को भी तुम शादी शुदा कर देना।
गर इज़ाज़त लेनी पड़े दरिया।
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गर हवाओं से इज़ाज़त लेनी पड़े सम्माओं को जलाने के लिये ताक पर रख दो जज़्बात अपने रखो अहसासों को भी आग में जलाने के लिए गर इज़ाज़त लेनी पड़े दरिया ख्वाबों में भी आने के लिये सुलगा दो ये जिस्म भी अपना उसकी यादों को जलाने के लिये। गर इज़ाज़त लेनी पड़े दरिया उसे मिलने बुलाने के लिये तप्त कर दो धरा को भरपूर जमीं से परिंदों को उड़ाने के लिये। गर इज़ाज़त लेनी पड़े दरिया उनसे बातें करने के लिये जला कर राख कर दो उस पल को जिसमे ख्याल आया हाले दिल सुनाने के लिये। गर इज़ाज़त लेनी पड़े दरिया हुस्न -ए- दीदार करने के लिये बहा दो आँशुओं की दरिया हुस्न को भी बहाने के लिये। गर इज़ाज़त लेनी पड़े दरिया को कस्तियां डुबाने के लिये तू रेत का ढेर हो जा दरिया तरसे मल्लाह कस्तियां तैराने के लिये।
कुंठित मानसिकता।
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मेरी सोंच उस आधुनिकता की भेंट नहीं चढ़ना चाहती थी जिसमें एक लड़की के बहुत से बॉयफ्रेंड हुआ करते हैं और ओ जब जिससे चाहे उससे बात करे , जहां जिसके साथ चाहे घूमे टहले , ओ आधी रात को आये या दोपहर को , मैं आशिक हूँ तो आशिक की तरह रहूं, उसे रोकने टोकने का मुझे कोई अधिकार न रहे। अगर इसे आधुनिकता और आधुनिकता में छुपी अय्यासी को ही आज़ादी कहते हैं तो मुझे सख़्त नफ़रत है उस आज़ादी से और उसका अनुसरण करने वाले आज़ाद पंछी से। इतने दिन बाद भी कोई दिन नहीं बीतता जो उसकी यादों के बगैर गुजर जाये क्योंकि मैंने उसे चाहा है दिल की अटूट गहराई से , जिस्म की आंच से भी उसे बचा के रखा है।नफ़रतों के साये तक न पड़ने दिया है उस पर।जिंदगी की एक अनमोल धरोहर की तरह मैने उसे छुपा के रखा है उसे अपने दिल के किसी कोने में जहां सिर्फ और सिर्फ ओ रहती है उसके सिवा कोई नहीं। अपने रिस्ते के धागे और उसके अदाओं की मोती की जो प्रेम रूपी माला बनाई है उसकी इकलौती वारिस और मालिकाना हक भी सिर्फ वही रखती है। निरंतर बहते नदी की धारा की तरह एक प्रेम का प्रवाह दूंगा उसे मैं। भले इसके लिए मुझे कितना भी कुंठित क्यों न होना पड़े। हां हां...
इश्क़ में वापसी का कोई रास्ता नहीं होता।
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झलक देख कर फ़लक तक जाने वालों इश्क़ में वापसी का कोई रास्ता नहीं होता होकर आओ कभी वैश्याओं की गलियों से वहां भोजन मिलता है कभी नास्ता नहीं होता। ख़्वाब मुकम्मल होते हैं तक़दीर की गहराइयों से सिर्फ हथेलियां घिसने से सौदा सस्ता नहीं होता। कसम है गर तुम्हें एक बार भी मैं रोकूं मरते इश्क़ से मेरा कोई वास्ता नहीं होता। गर समझती तुम गिड़गिड़ाहट मेरी भी सनम हमारे दरमियां इतना बड़ा हादसा नहीं होता।
कहां लिखा है।
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बिछड़ कर तुमसे तेरा होना कहां लिखा है मेरी किस्मत में अब सोना कहां लिखा है। चाहो तो गलियां मेरी भी रोशन हो जाये खुदा वरना अंधेरे को उजाले का होना कहां लिखा है। कही थी बगैर मेरे मर तो नहीं जाओगे मेरी हालात पर तुम्हें अब रोना कहां लिखा है। मोती की तरह जो आज बह रहे हो अश्क़ मेरी आँखों का तेरा अब होना कहां लिखा है।
कभी तो याद मुझे भी करोगी।
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कभी तो याद मुझे भी करोगी देखूंगा फिर कैसे तुम रहोगी। समझता हूँ कि जान हो मेरी कभी तो मुझे आप समझोगी समझोगी जान जिस दिन मुझे देखूंगा कैसे जान के बगैर रहोगी। लत तुम्हारी है जो मुझको सनम आज दर- ब- दर मैं भटकता हूँ हो जाएगी जिस दिन लत हमारी देखूंगा जितनी सयंमित रहोगी। मज़बूर हूँ आज अपने दिल की बेवजह सूनसान चाहतों से सनम एक बार इश्क़ तुम्हे भी हो जाये देखूंगा कैसे महबूब के बगैर रहोगी।